Mahagathbandhan candidates पटना: आगामी विधानसभा चुनाव (या किसी भी हालिया चुनाव संदर्भ के अनुसार) के लिए महागठबंधन ने जिस तरह से अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है उससे स्पष्ट होता है कि दोनों मुख्य घटक दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस अपनी-अपनी पारंपरिक सियासी ताकत पर भरोसा कर रहे हैं। टिकट बंटवारे के विश्लेषण से पता चलता है कि RJD ने अपने कोर वोट बैंक यादवों पर सबसे ज़्यादा दांव लगाया है जबकि कांग्रेस ने एक नई रणनीति के तहत सवर्ण जातियों (ऊंची जातियों) को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं।
RJD: यादव-मुस्लिम समीकरण पर मज़बूत पकड़
RJD ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसका चुनावी आधार ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर टिका है। घोषित उम्मीदवारों में एक बड़ा हिस्सा यादव उम्मीदवारों का है। यह संख्या कुल टिकटों का लगभग एक तिहाई या उससे अधिक है जो बिहार में इस जाति की आबादी के अनुपात से कहीं अधिक है। यह रणनीति पार्टी को अपनी पारंपरिक राजनीतिक जमीन पर मज़बूत पकड़ बनाए रखने में मदद करती है। RJD ने मुस्लिमों को भी अच्छी खासी संख्या में टिकट दिए हैं जिससे ‘MY’ समीकरण को और बल मिलता है। हालांकि, इस बार अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और अन्य जातियों को कम प्रतिनिधित्व देने के कारण विपक्षी दलों को आलोचना का मौका मिल गया है।
कांग्रेस: सवर्ण कार्ड खेलकर नए समीकरण की तलाश
इसके विपरीत, कांग्रेस पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए सवर्ण जातियों को टिकट वितरण में वरीयता दी है। कांग्रेस ने अपने कोटे की सीटों में से एक तिहाई से अधिक पर सवर्ण उम्मीदवार उतारे हैं जिनमें भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण शामिल हैं। यह कदम कांग्रेस द्वारा एक नए सामाजिक आधार को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि पार्टी सवर्ण समुदाय में NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के खिलाफ पनप रहे असंतोष को भुनाने की कोशिश कर रही है।
चुनावी समीकरण और चुनौतियाँ
महागठबंधन का यह जातिगत समीकरण दोधारी तलवार जैसा है। RJD की यादव-केंद्रित राजनीति जहां उसके कोर वोटरों को लामबंद करेगी, वहीं कांग्रेस का सवर्णों पर दांव गठबंधन के लिए ‘A to Z’ (सभी वर्गों) को साथ लाने के दावे को संतुलित कर सकता है। हालांकि टिकट बंटवारे में अति पिछड़ा वर्ग और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों की अपेक्षित अनदेखी, विशेषकर RJD की ओर से महागठबधन के लिए एक चुनौती भी पेश करती है। इन जातियों को साधने के लिए अब दोनों दलों को चुनाव प्रचार में कड़ी मेहनत करनी होगी। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इन दो अलग-अलग रणनीतियों का मेल ही बिहार के चुनावी नतीजों को तय करेगा।