SC to examine नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या दूसरे बच्चे के लिए सरोगेसी पर रोक लगाना नागरिकों के निजी जीवन में राज्य का हस्तक्षेप है। जस्टिस बीवी नागरथना की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
सरकार का तर्क
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा है कि सरोगेसी एक मौलिक अधिकार नहीं है और इसमें एक अन्य महिला के शरीर का उपयोग शामिल है। सरकार ने तर्क दिया कि सरोगेसी को केवल उन जोड़ों के लिए अनुमति दी जानी चाहिए जो प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने में असमर्थ हैं और जिन्होंने अन्य सभी विकल्पों को आजमाया है।
पीड़ित परिवार का पक्ष
वहीं पीड़ित परिवार के वकील मोहिनी प्रिय ने तर्क दिया कि दूसरे बच्चे के लिए सरोगेसी पर रोक लगाना नागरिकों के पुनरुत्पादक विकल्पों में राज्य का हस्तक्षेप है। उन्होंने कहा कि सरकार को नागरिकों के निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और उन्हें अपने पुनरुत्पादक विकल्प चुनने की अनुमति देनी चाहिए।
क्या है मामला?
यह मामला एक ऐसे जोड़े से जुड़ा है जो द्वितीयक बांझपन से पीड़ित हैं और दूसरे बच्चे के लिए सरोगेसी का विकल्प चुनना चाहते हैं। हालांकि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अनुसार उन जोड़ों को सरोगेसी की अनुमति नहीं है जिनके पास पहले से ही एक स्वस्थ बच्चा है।
अदालत की टिप्पणी
जस्टिस नागरथना ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि इस प्रावधान के पीछे का उद्देश्य समझने योग्य है लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि नागरिकों के निजी जीवन में राज्य के हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई के लिए तारीख निर्धारित की है।