SC Finds नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने मेकदातु जलाशय परियोजना के खिलाफ तमिलनाडु सरकार की ओर से दायर याचिका को “असमय” करार देते हुए कहा कि फिलहाल इस मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। अदालत ने कहा कि परियोजना अभी शुरुआती चरण में है, इसलिए इसे चुनौती देना “पूर्वकालिक” माना जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि फिलहाल कर्नाटक सरकार ने मेकदातु परियोजना को लागू करने के लिए केवल पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया शुरू की है, और अब तक निर्माण कार्य या जल बंटवारे से संबंधित कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ऐसे में अदालत का दखल देना उचित नहीं होगा।
तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में दावा किया था कि मेकदातु बांध परियोजना कावेरी नदी जल विवाद ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश का उल्लंघन करती है। तमिलनाडु का कहना था कि कर्नाटक इस परियोजना के माध्यम से कावेरी के जल प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है जिससे राज्य के किसानों को नुकसान पहुंचेगा।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक परियोजना को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित प्राधिकरणों से अंतिम स्वीकृति नहीं मिल जाती, तब तक यह कहना जल्दबाजी होगी कि कर्नाटक ने किसी नियम का उल्लंघन किया है। न्यायालय ने तमिलनाडु को यह भी आश्वस्त किया कि यदि भविष्य में परियोजना के क्रियान्वयन से कावेरी जल समझौते पर कोई असर पड़ता है, तो वह कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है।
कर्नाटक सरकार ने अदालत में कहा कि मेकदातु परियोजना का उद्देश्य राज्य के नागरिकों के लिए पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना है और यह कावेरी जल बंटवारे के हिस्से को प्रभावित नहीं करेगा। राज्य सरकार ने कहा कि तमिलनाडु का आरोप “राजनीतिक और निराधार” है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल मेकदातु परियोजना पर कोई रोक नहीं है लेकिन इसे आगे बढ़ाने के लिए कर्नाटक को केंद्रीय स्वीकृतियों और पर्यावरणीय नियमों का पालन करना होगा।यह मामला एक बार फिर कावेरी जल विवाद को राजनीतिक और कानूनी रूप से सुर्खियों में ले आया है। दोनों राज्यों के बीच दशकों पुराना यह जल विवाद अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है और मेकदातु परियोजना इस विवाद का नया अध्याय बनती दिख रही है।