पर्वतीय जलस्तंभ और राष्ट्रीय जल सुरक्षा पर मंडराता खतरा

पर्वत पृथ्वी के प्राकृतिक जलस्तंभ हैं और इन्हें वैज्ञानिक रूप से वॉटर टावर्स कहा जाता है। विश्व की लगभग एक तिहाई आबादी पर्वतीय क्षेत्रों से निकलने वाले मीठे जल पर निर्भर मानी जाती है। भारत में गंगा यमुना ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियाँ हिमालयी हिमनदों से जन्म लेती हैं। इन नदियों का प्रवाह देश के लगभग पैंतीस प्रतिशत भूभाग को सिंचाई पीने और ऊर्जा उत्पादन के लिए आधार प्रदान करता है। इसलिए पर्वतीय पारिस्थितिकी का संरक्षण केवल पहाड़ी राज्यों का विषय नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की जल सुरक्षा से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

 

जलवायु परिवर्तन के कारण बीते कुछ दशकों में हिमालयी हिमनदों का पिघलना तेज हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार कई प्रमुख हिमनद प्रतिवर्ष बीस से पच्चीस मीटर तक पीछे हट रहे हैं। यह तेजी भविष्य में जल प्रवाह में असंतुलन पैदा कर सकती है और मैदानों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए पेयजल और सिंचाई संकट को बढ़ा सकती है। ऐसे में पर्वतीय वन आवरण बढ़ाने ग्लेशियर संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध निर्माण रोकने और पारिस्थितिकी के अनुसार विकास मॉडल अपनाने जैसे कदम जरूरी हैं।

 

राष्ट्र को पर्वतीय जलस्तंभों को एक साझा जल राष्ट्रीय संपदा के रूप में देखना चाहिए। इनके संरक्षण में जन भागीदारी वैज्ञानिक निगरानी और दीर्घकालिक नीति समर्थन की अनिवार्य भूमिका है।

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