ढाका :- ढाका में प्रतियोगिता से लौटते समय भारतीय तीरंदाजों के सामने ऐसी चुनौती खड़ी हो गई जिसने उनकी सहनशक्ति और धैर्य दोनों की कठिन परीक्षा ले ली। अचानक उड़ान रद हो जाने के बाद उन्हें लगभग दस घंटे तक एयरपोर्ट और उसके बाहर असुरक्षित तथा असुविधाजनक माहौल में बिताने पड़े। इस दौरान उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई और उन्हें खुद ही अपने लिए सुरक्षित जगह तलाशनी पड़ी।
तीरंदाजों के अनुसार न तो एयरलाइन ने कोई स्पष्ट जानकारी दी और न ही खाने पीने की व्यवस्था की। देर रात उन्हें एक ऐसी जगह ठहराया गया जो न तो साफ थी और न ही सुरक्षित महसूस हो रही थी। दरवाजों की टूट फूट और कमरे की गंदगी ने खिलाड़ियों को पूरी रात बेचैनी में रखा। कई खिलाड़ियों ने बताया कि उस जगह पर रहना मजबूरी थी वरना वे खुले में रात बिताने पर विवश हो जाते।
इस पूरी घटना ने यह सवाल एक बार फिर उठा दिया है कि अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान खिलाड़ियों की सुरक्षा और सहायता को लेकर जिम्मेदारी किसकी होती है। जब खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने विदेश जाते हैं तब उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे। लेकिन जब बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध न हों तो ऐसी परिस्थितियों में मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का दबाव बढ़ जाता है।
तीरंदाजों ने बताया कि रात भर जागकर बिताना उनके लिए बेहद कठिन था पर उन्होंने एक दूसरे का साथ देकर स्थिति का सामना किया। सुबह होते ही उन्होंने दोबारा उड़ान की व्यवस्था की और कई घंटों की थकान तथा तनाव के बाद आखिरकार सुरक्षित रवाना हो पाए।
यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि खिलाड़ियों को सिर्फ मैदान में ही नहीं बल्कि यात्रा के दौरान भी संरक्षण और सम्मान मिलना चाहिए। यह आवश्यक है कि संबंधित एजेंसियां भविष्य में ऐसी परिस्थिति न बनने दें ताकि खिलाड़ियों का ध्यान सिर्फ अपने खेल पर केंद्रित रहे और वे देश का नाम रोशन करते रहें।