नई दिल्ली :- भारतीय राजनीति में अमित शाह एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिनकी कार्यशैली और वैचारिक दृढ़ता उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान देती है। इसी पहचान का एक सबसे उल्लेखनीय पहलू है उनका लगभग 20 सालों से किसी भी विदेशी यात्रा पर न जाना। उनकी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 2006 के बाद से शाह ने न कोई औपचारिक विदेश दौरा किया है और न ही कोई निजी यात्रा।
यह स्थिति तब और विशेष हो जाती है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे शीर्ष नेता बीते 11 सालों में 90 से अधिक विदेशी यात्राएं कर चुके हैं और वैश्विक कूटनीति में भारत की भूमिका को लगातार विस्तारित कर रहे हैं। ऐसे माहौल में शाह का घरेलू धरती से बाहर न निकलना एक अलग ही राजनीतिक संदेश देता है।
सोची-समझी वैचारिक रणनीति
लोगों का कहना है कि यह किसी अनिच्छा का परिणाम नहीं, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक रणनीति है। वे स्वयं को पूर्णतः ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचारधारा पर खड़ा नेता प्रस्तुत करना चाहते हैं ऐसा नेता जिसकी ऊर्जा, पहचान और राजनीतिक शक्ति भारत की मिट्टी से ही आती है। अंग्रेजीभाषी अभिजात वर्ग से दूरी और हिंदी को राजनीतिक संवाद की मुख्य धुरी बनाने का आग्रह भी इसी रणनीति का विस्तार माना जाता है।