नीतीश कुमार की ऐतिहासिक वापसी और बिहार की बदलती सियासत की कहानी

पटना (बिहार):- बिहार की राजनीति में पलटू राम के नाम से पहचाने जाने वाले नीतीश कुमार ने इस गुरुवार को दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक ऐसा इतिहास रचा है जिसकी मिसाल भारतीय राजनीति में बहुत कम देखने को मिलती है। पटना के गांधी मैदान में आयोजित भव्य शपथ ग्रहण समारोह में मंच पर रोशनी और तालियों की गूंज जरूर थी लेकिन सियासत का असली खेल मंच के पीछे चल रहा था जहां सत्ता समीकरण और रणनीति की नई पटकथा लिखी जा रही थी।

 

नीतीश कुमार का सत्ता में लौटना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक ऐसे नेता की कहानी है जिसने हालातों के अनुसार खुद को कई बार बदला और हर बार राजनीतिक गणित को अपने पक्ष में मोड़ लिया। लोग उन्हें पलटू राम भले कहते हों लेकिन यह भी सच है कि वे हर बार परिस्थितियों को समझकर नई दिशा तय करने में माहिर रहे हैं। इस बार भी उनके फैसले ने बिहार की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।

 

गांधी मैदान में जहां जनता और समर्थक उत्साहित नजर आए वहीं राजनीतिक जानकारों की निगाहें उन दांवों पर टिकी थीं जिन्होंने इस बार की सत्ता यात्रा को संभव बनाया। यह बात किसी से छिपी नहीं कि नीतीश कुमार ने अपने पूरे करियर में गठबंधन की राजनीति को एक अलग स्तर पर पहुंचाया। कभी एक पक्ष में तो कभी दूसरे पक्ष में झुककर उन्होंने बार बार बिहार की सत्ता को अपने नियंत्रण में रखने की कला साबित की है।

इस शपथ ग्रहण ने यह साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार आज भी बिहार की राजनीति में सबसे निर्णायक चेहरे के रूप में मौजूद हैं। चाहे लोग उनकी रणनीतियों की आलोचना करें या सराहना करें पर यह सच है कि वे बिहार की सत्ता राजनीति के केंद्र बिंदु बने हुए हैं। उनकी यह वापसी आने वाले वर्षों में राज्य की राजनीति में नई हलचल और नए समीकरण पैदा करने वाली है और इसी कारण बिहार की जनता और पूरे देश की निगाहें अब फिर से नीतीश कुमार की अगली चाल पर टिकी हैं।

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