नक्सलवाद पर समाज की दृढ़ इच्छा शक्ति और राष्ट्रीय एकजुटता का संदेश

नई दिल्ली :- स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नक्सलवाद के अंत को लेकर एक महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किया है जिसमें उन्होंने समाज की सामूहिक शक्ति को निर्णायक तत्व बताया है। उनका कहना है कि नक्सलवाद तब तक प्रबल रहा जब तक समाज ने इसे मजबूरी की तरह स्वीकार किया लेकिन जैसे ही लोगों ने ठान लिया कि यह अन्याय अब और नहीं सहा जाएगा उसी क्षण से इसके पतन की शुरुआत हो गई। यह संदेश न केवल सुरक्षा व्यवस्था को प्रोत्साहित करता है बल्कि नागरिकों को यह भी समझाता है कि किसी भी समस्या का समाधान तभी संभव है जब जनता एकजुट होकर दृढ़ संकल्प दिखाए।

 

पिछले कुछ दशकों में नक्सलवाद ने देश के अनेक राज्यों में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा किया था। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य रुक गए थे और प्रशासनिक ढांचा प्रभावित हुआ था। शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही थीं। लेकिन धीरे धीरे जब स्थानीय समुदायों ने नक्सली दबाव से बाहर निकलने का निर्णय लिया और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर खड़े हुए तब हालात बदलने लगे। समाज की बदलती सोच ने सुरक्षा एजेंसियों को मजबूत आधार प्रदान किया और नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों को गति मिली।

 

मोहन भागवत का यह बयान इस तथ्य को रेखांकित करता है कि समाज जब किसी समस्या को समाप्त करने का निश्चय कर लेता है तो परिणाम अवश्य सामने आता है। नक्सलवाद का कमजोर होना प्रशासन की रणनीति का परिणाम जरूर है लेकिन इसके पीछे जनता की अटूट इच्छाशक्ति सबसे बड़ा कारण बनी है। गांवों में जागरूकता बढ़ी लोगों ने संवाद को अपनाया और हिंसा के रास्ते से दूरी बनाई।

यह विचार आज के समय में भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि समाजिक समस्याओं का समाधान केवल कानून से नहीं बल्कि समाज की जागरूकता और सामूहिक संकल्प से ही संभव है। नक्सलवाद पर रोक इसी एकजुट भावना का परिणाम है और यही भावना देश को मजबूत भविष्य की ओर ले जाती है।

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