नई दिल्ली:- केंद्र सरकार ने देश के पुराने श्रम कानूनों को सरल और प्रभावी बनाने के लिए चार नई श्रम संहिताओं को लागू करने का निर्णय लिया है। इन नई संहिताओं का उद्देश्य कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों के लिए एक पारदर्शी और संतुलित कार्य व्यवस्था तैयार करना है। इन बदलावों का सबसे बड़ा प्रभाव कंपनियों के वेतन ढांचे पर पड़ेगा क्योंकि नए नियमों के तहत बेसिक वेतन का हिस्सा पहले से अधिक होगा जिससे कर्मचारियों की ग्रेच्युटी और पीएफ की गणना पूरी तरह बदल जाएगी।
नए ढांचे में यह प्रावधान है कि कर्मचारी के कुल वेतन का पचास प्रतिशत हिस्सा बेसिक और अलाउंस की श्रेणी में आएगा। अभी तक कई कंपनियां बेसिक वेतन को कम रखकर भिन्न भिन्न भत्तों के माध्यम से वेतन का बड़ा हिस्सा प्रदान करती थीं जिससे पीएफ और ग्रेच्युटी का योगदान कम रहता था। लेकिन अब बेसिक वेतन बढ़ने के कारण पीएफ और ग्रेच्युटी की राशि भी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। इस परिवर्तन से कर्मचारियों को लंबे समय में अधिक लाभ मिलेगा क्योंकि उनकी सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी और सेवानिवृत्ति के बाद अधिक आर्थिक सहारा प्राप्त होगा।
दूसरी तरफ नियोक्ताओं के लिए यह बदलाव कई आर्थिक चुनौतियां लेकर आ सकता है क्योंकि बढ़े हुए पीएफ और ग्रेच्युटी योगदान से कंपनियों की लागत में वृद्धि होगी। कई संस्थानों को अपने मौजूदा वेतन ढांचे नीतियों और वित्तीय योजना में संशोधन करना पड़ेगा ताकि वे नए नियमों का पालन कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिवर्तन प्रारंभिक दौर में कंपनियों पर भार डाल सकता है लेकिन लंबे समय में इससे कार्यस्थल में स्थिरता और पेशेवर पारदर्शिता बढ़ेगी।
नई श्रम संहिताएं देश में संगठित और असंगठित दोनों तरह के कर्मचारियों को अधिक सुरक्षा देने पर केंद्रित हैं। इससे न केवल श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि रोजगार बाजार में पारदर्शिता भी बढ़ेगी। सरकार का यह कदम एक आधुनिक और समावेशी कार्य वातावरण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिसमें कर्मचारी और संस्थान दोनों अधिक संरचित और सुरक्षित श्रम प्रणाली के अंतर्गत कार्य करेंगे।