महिला सुरक्षा के सवाल और डिजिटल युग में उभरती आक्रोश की आवाजें

नई दिल्ली :- बुधवार को सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया और समाज को भी सोचने पर मजबूर किया कि आखिर युवा पीढ़ी में बढ़ते आक्रोश के पीछे क्या कारण हैं। एक युवती द्वारा लाइव होकर अपनी नाराजगी प्रकट करना और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि डिजिटल मंच आज सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं बल्कि असंतोष व्यक्त करने का जरिया भी बन गया है। हालांकि कानून अपने दायरे में किसी भी प्रकार की धमकी या हिंसक बयान को स्वीकार नहीं करता लेकिन इस घटना ने असल मुद्दे की ओर भी ध्यान खींचा है।

 

महिलाओं की सुरक्षा भारत में लंबे समय से एक चुनौती बनी हुई है। सरकारें नीतियां बनाती हैं कानून सख्त किए जाते हैं पुलिस बल को तकनीकी रूप से सशक्त करने के प्रयास किए जाते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई महिलाओं को सुरक्षित माहौल नहीं मिल पाता। इसी असुरक्षा की भावना से उपजा आक्रोश अक्सर सोशल मीडिया पर भड़क कर सामने आता है जहां लोग खुलकर अपनी बात रखते हैं। यह मंच एक ओर लोगों को आवाज देता है तो दूसरी ओर कभी कभी भावनाओं के तीव्र बहाव में वे अनुचित और कानून विरोधी शब्दों का प्रयोग भी कर बैठते हैं।

 

इस प्रकार की घटना यह संकेत भी देती है कि समाज में संवाद की कमी और समस्याओं की अनदेखी लोगों के भीतर तनाव और असंतोष को बढ़ा देती है। जरूरत इस बात की है कि शिकायत दर्ज करने से लेकर न्याय मिलने तक की प्रक्रिया को इतना आसान और पारदर्शी बनाया जाए कि कोई भी व्यक्ति खुद को असहाय महसूस न करे। साथ ही सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी मंच हिंसा उकसाने का जरिया न बने।

समाधान यह है कि सरकार प्रशासन और समाज मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें जहां महिलाएं सुरक्षित महसूस करें और लोग अपनी समस्याएं शांतिपूर्ण और वैधानिक तरीके से व्यक्त कर सकें। डिजिटल मंच आवाज देने का साधन जरूर बने लेकिन हिंसा की ओर बढ़ने का नहीं।

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