नई दिल्ली :- कच्चे तेल की कीमतों में पिछले चार महीनों से जारी गिरावट वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत बन गई है। कीमतों में यह लगातार चौथा महीना कमजोरी दर्ज कराएगा और यह दो से अधिक वर्षों की सबसे लंबी गिरावट का दौर साबित हो सकता है। इस गिरावट ने न केवल तेल उत्पादक देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं बल्कि निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
बाजार की नजरें अब उस अहम बैठक पर हैं जो इस सप्ताहांत ओपेक प्लस समूह आयोजित करने जा रहा है। यह संगठन विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों का प्रतिनिधित्व करता है और इसके निर्णयों का सीधा प्रभाव वैश्विक कीमतों पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ओपेक प्लस उत्पादन में नई कटौती या मौजूदा नीतियों में बदलाव का संकेत देता है तो कीमतों में स्थिरता या हल्की बढ़त देखी जा सकती है। इसके विपरीत यदि बैठक में कोई ठोस निर्णय नहीं निकलता तो गिरावट का सिलसिला और लंबा हो सकता है।
इसी के साथ यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने के लिए अमेरिका की अगुवाई में चल रही कूटनीतिक कोशिशों पर भी बाजार की पैनी निगाहें बनी हुई हैं। युद्ध के चलते ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में उत्पन्न अस्थिरता पिछले दो वर्षों से वैश्विक कीमतों को प्रभावित करती रही है। यदि शांति वार्ताओं में प्रगति होती है तो आपूर्ति संबंधी दबाव कम होगा और इससे कीमतों पर और नीचे की तरफ दबाव आ सकता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो वर्तमान परिस्थितियां तेल बाजार में गहरी अनिश्चितता का संकेत देती हैं। जहां उपभोक्ता देशों के लिए यह राहत का समय है वहीं उत्पादक देश अपनी आय में गिरावट को लेकर दबाव में हैं। अब बाजार की दिशा काफी हद तक ओपेक प्लस के फैसलों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक पहलों पर निर्भर करेगी।