नई दिल्ली :- राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे से ठीक पहले जर्मनी फ्रांस और ब्रिटेन के शीर्ष राजनयिकों द्वारा प्रकाशित संयुक्त लेख ने राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में तेज बहस छेड़ दी है। इस लेख में अंतरराष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक नीतियों से जुड़े कई बिंदुओं पर टिप्पणी की गई जिसके बाद भारत के कुछ राजनीतिक वर्गों और विशेषज्ञों ने इसे अनुचित समय पर किया गया हस्तक्षेप बताया। उनका कहना है कि किसी भी बड़े द्विपक्षीय दौरे से पहले इस तरह का सामूहिक वक्तव्य संदेश देने की राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
भारत में मौजूद इन देशों के दूतावासों का पक्ष है कि लेख का उद्देश्य केवल अपनी सामूहिक चिंताओं और वैश्विक मुद्दों पर विचार रखने तक सीमित है और इसका कोई राजनीतिक लक्ष्य नहीं है। हालांकि यह तर्क सभी को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है क्योंकि लेख के प्रकाशन का समय कई सवाल खड़े करता है। पुतिन के भारत आगमन को पहले से ही विश्व राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और ऐसे में पश्चिमी देशों के प्रतिनिधियों का संयुक्त रूप से सामने आना कई संकेत छोड़ जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक मंच पर शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है और भारत इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। ऐसे में किसी भी बड़े नेता के दौरे को लेकर स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। वहीं कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि इस तरह के लेख भविष्य की रणनीतिक पोजिशनिंग को दर्शाते हैं और आने वाले समय में वैश्विक संबंधों की दिशा को तय करने में भूमिका निभा सकते हैं।
कुल मिलाकर पुतिन के दौरे से पहले आया यह संयुक्त लेख भारतीय कूटनीति के लिए एक नए विमर्श को जन्म दे रहा है और यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस पूरे घटनाक्रम को किस रूप में लेता है।