राजनीतिक चंदे का बदलता परिदृश्य और ट्रस्ट मॉडल का बढ़ता प्रभाव

नई दिल्ली :- इलेक्टोरल बॉन्ड समाप्त होने के बाद यह अनुमान लगाया जा रहा था कि राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग पर बड़ा असर पड़ेगा लेकिन 2024 25 के शुरुआती आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों के बीच अब ट्रस्ट आधारित फंडिंग मॉडल तेजी से केंद्र में आता दिख रहा है। इसी मॉडल के जरिए सबसे ज्यादा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला है। टाटा समूह के नियंत्रण में चल रहा प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट वर्ष 2024 25 में कुल नौ सौ पंद्रह करोड़ रुपये का चंदा बांटने वाला सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बनकर उभरा। इसमें से लगभग तिरासी प्रतिशत रकम सीधे भाजपा के खाते में गई है। यह आंकड़ा बताता है कि राजनीतिक फंडिंग की धारा इलेक्टोरल बॉन्ड के बाद भी उसी दिशा में बह रही है जहां बड़े कॉर्पोरेट समूह अपने भरोसेमंद माध्यमों से योगदान देना चाहते हैं।

 

ट्रस्ट मॉडल को लेकर यह तर्क दिया जाता है कि इसमें दानदाताओं की पहचान पहले से निर्धारित होती है और वितरण प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से सरल रहती है। यही कारण है कि कई कंपनियां वही तरीका चुनती हैं जहां उन्हें किसी कानूनी विवाद या गवर्नेंस संबंधी जोखिम का सामना न करना पड़े। हालांकि आलोचकों का मानना है कि इस प्रणाली में भी पारदर्शिता की कमी बनी हुई है क्योंकि बड़े कॉर्पोरेट ट्रस्टों का राजनीतिक झुकाव खुले तौर पर दिखाई देता है। चुनावी स्वच्छता की दृष्टि से यह बहस लगातार गहराती जा रही है कि देश को ऐसी प्रणाली की जरूरत है जो चंदे की उत्पत्ति और उपयोग दोनों को स्पष्ट रूप से सामने रख सके।

इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि मौजूदा व्यवस्था में भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी अपनी मजबूत नेटवर्किंग और कॉर्पोरेट विश्वसनीयता के आधार पर बड़ी मात्रा में फंड जुटाने में सफल है। इलेक्टोरल बॉन्ड खत्म होने के बाद भी संसाधनों का प्रवाह जिस प्रकार से बना हुआ है वह यह संदेश देता है कि राजनीतिक फंडिंग के स्वरूप बदल सकते हैं लेकिन वित्तीय शक्ति का समीकरण बहुत जल्दी नहीं बदलता।

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