नई दिल्ली :- 4–5 दिसंबर को नई दिल्ली में आयोजित 23वें भारत–रूस शिखर सम्मेलन ने कई मायनों में दोनों देशों के संबंधों की दिशा और प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब वैश्विक राजनीति में भू–रणनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और भारत तथा रूस दोनों ही अपने–अपने क्षेत्रीय हितों को मज़बूत करने के लिए नए साझेदारी मॉडल तलाश रहे हैं।
सम्मेलन के परिणामों को लेकर विशेषज्ञों के बीच मतभेद दिखे। कुछ विश्लेषकों ने इसे काफी फायदेमंद, तो कुछ ने अपेक्षाओं के अनुरूप न होने के कारण निराशाजनक बताया।
शिखर बैठक में इस बार पारंपरिक रक्षा समझौतों से अधिक जोर व्यापार, ऊर्जा, उर्वरक, वर्कफ़ोर्स विकास और आर्थिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों पर रहा। भारत और रूस ने यह स्वीकार किया कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक सहयोग की नई राहें खोजने और दोतरफा व्यापार को नई ऊंचाई पर ले जाने की जरूरत है।
मुख्य फोकस क्षेत्र:
1. व्यापार विस्तार: दोनों देशों ने 2030 तक व्यापारिक कारोबार को और बढ़ाने का लक्ष्य रखा। खासकर फार्मा, कृषि, कोयला और खनिज क्षेत्रों में साझेदारी पर जोर दिया गया।
2. ऊर्जा सहयोग: रूस भारत को कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति बढ़ाने पर सहमत दिखा। भारत ने भी सुरक्षित और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति पर जोर दिया।
3. उर्वरक आपूर्ति: रूसी निर्यात पर निर्भर भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण पहलू रहा। रूस ने उर्वरकों की समयबद्ध आपूर्ति सुनिश्चित करने का भरोसा दिया।
4. वर्कफ़ोर्स और कौशल विकास: भारत ने अपने कुशल युवाओं को रूस में रोजगार अवसरों से जोड़ने पर ध्यान दिया। यह क्षेत्र भविष्य की साझेदारी का नया आयाम माना जा रहा है।
5. आर्थिक साझेदारी: दोनों देशों ने रूपये–रूबल व्यापार तंत्र को सुचारू बनाने पर चर्चा की ताकि डॉलर पर निर्भरता कम हो सके।
निष्कर्ष:
सम्मेलन ने भारत–रूस संबंधों में आर्थिक और व्यापारिक आयामों को आगे बढ़ाया, हालांकि रक्षा सहयोग पर अपेक्षा के अनुरूप प्रगति नहीं होने से कुछ विशेषज्ञ निराश भी रहे। इसके बावजूद, यह शिखर सम्मेलन दोनों देशों की साझेदारी को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।