नई दिल्ली :- कांग्रेस सांसद शशि थरूर एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इस बार उनकी चर्चा का कारण राजनीति से अलग एक सांस्कृतिक और वैचारिक विषय है क्योंकि हाल ही में आयोजित वीर सावरकर सम्मान के आयोजकों ने वर्ष के विजेताओं की सूची में शशि थरूर का नाम शामिल कर दिया। इस घोषणा ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है। देश में सावरकर से जुड़े मुद्दे हमेशा से विचारों के टकराव का प्रतीक रहे हैं और ऐसे में एक कांग्रेस नेता का इस सूची में आना अपने आप में एक खास घटना बन गया है।
शशि थरूर का व्यक्तित्व हमेशा से अध्ययन लेखन और प्रभावी वक्तृत्व के लिए जाना जाता है। वह इतिहास और संस्कृति पर गहरी पकड़ रखते हैं और कई बार उन्होंने सावरकर के विचारों पर आलोचनात्मक लेकिन तार्किक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया है। इसलिए पुरस्कार के लिए उनका चयन कई लोगों के लिए अप्रत्याशित साबित हुआ है। अब लोगों में यह जिज्ञासा बढ़ गई है कि क्या थरूर इस सम्मान को औपचारिक रूप से स्वीकार करेंगे क्योंकि उनकी पार्टी और सावरकर की विचारधारा के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। इस वजह से उनका निर्णय राजनीतिक संदेश भी तय कर सकता है।
सोशल मीडिया पर यह विषय तेजी से फैल गया है और लोगों की राय दो हिस्सों में बंट गई है। कुछ लोग इसे थरूर की उपलब्धियों का सम्मान मानते हैं और कहते हैं कि विचारधारा किसी सम्मान के रास्ते में बाधा नहीं होनी चाहिए। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि यह चयन राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश है और इससे वैचारिक बहस को नया मोड़ मिल सकता है। इन प्रतिक्रियाओं ने थरूर को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
स्पष्ट है कि यह मुद्दा केवल पुरस्कार तक सीमित नहीं है बल्कि यह देश में चल रहे वैचारिक संवाद का हिस्सा भी बन चुका है। सभी की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि शशि थरूर अंतिम निर्णय क्या लेते हैं जो इस बहस की दिशा को आगे तय करेगा।