दिल्ली:- स्वामी अड़गड़ानंद जी ने अपनी पुस्तक “यथार्थ गीता” के माध्यम से भारतीय समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। उन्होंने गीता के मूल संदेश को पुनः प्रस्तुत करते हुए समाज को एकता और शांति का मार्ग दिखाया है।
स्वामी जी के अनुसार जाति मात्र दो हैं – देवता और असुर। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दैवीय संपदाओं से युक्त है, वह देवता है और जो आसुरी संपदाओं से युक्त है वह असुर है। उन्होंने समाज को अपने अंतकरण को शुद्ध करके देवता बनने का प्रयास करने का आह्वान किया है स्वामी जी ने ज्ञान और यज्ञ के नाम पर चल रहे कर्मकांडों की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ज्ञान ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी, आत्मा के आधिपत्य में आचरण तत्व में अर्थ स्वरुप परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही “ज्ञान” है और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है वह अज्ञान है।
स्वामी जी ने चारों वर्णों को जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि कर्म के आधार पर परिभाषित किया है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। उन्होंने समाज को इन चारों वर्णों को कर्म के आधार पर समझने का आह्वान किया है स्वामी अड़गड़ानंद जी की “यथार्थ गीता” आज विश्व में एक नई दिशा का सूचक बन गई है। यह पुस्तक समाज को एकत, शांति और ज्ञान का मार्ग दिखा रही है।