देहरादून (उत्तराखंड):- उत्तराखंड में धर्मांतरण से जुड़े सख्त कानून पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। राज्यपाल ने सरकार द्वारा भेजे गए उस विधेयक को वापस लौटा दिया है जिसमें जबरन या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने पर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान रखा गया था। राज्यपाल की आपत्तियों के बाद अब यह बिल दोबारा विचार के लिए राज्य सरकार के पास पहुंच गया है।
बताया जा रहा है कि राज्यपाल ने विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर सवाल उठाए हैं। खास तौर पर उम्रकैद जैसी कड़ी सजा को लेकर यह चिंता जताई गई है कि क्या यह सजा अपराध की प्रकृति के अनुपात में है या नहीं। राज्यपाल ने यह भी पूछा है कि क्या मौजूदा कानूनों में पहले से मौजूद प्रावधानों के बावजूद इतनी कठोर सजा की आवश्यकता है।
इसके अलावा बिल में परिभाषाओं की स्पष्टता को लेकर भी आपत्ति जताई गई है। धर्मांतरण की प्रक्रिया स्वेच्छा से हुई है या दबाव में यह तय करने के मानदंडों को और स्पष्ट करने की जरूरत बताई गई है। राज्यपाल का मानना है कि अस्पष्ट परिभाषाओं के चलते कानून का दुरुपयोग होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सरकार की ओर से इस बिल को समाज में जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाया गया था। सरकार का तर्क था कि सख्त सजा का प्रावधान होने से ऐसे मामलों में कमी आएगी और लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा होगी। विधानसभा से पारित होने के बाद इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा गया था।
अब राज्य सरकार के सामने दो विकल्प हैं। पहला यह कि वह राज्यपाल की आपत्तियों के अनुरूप बिल में संशोधन करे। दूसरा यह कि वही बिल दोबारा विधानसभा से पारित कराकर फिर से राज्यपाल को भेजे। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बिना बदलाव के बिल को आगे बढ़ाना कानूनी विवाद को जन्म दे सकता है।
कुल मिलाकर राज्यपाल की आपत्ति के बाद उत्तराखंड का धर्मांतरण कानून एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। आने वाले दिनों में सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।