Child Trafficking नई दिल्ली: भारत के उच्चतम न्यायालय ने देश में बढ़ती बाल तस्करी और बच्चों के व्यावसायिक यौन शोषण पर कड़ी चिंता व्यक्त करते हुए इसे एक ‘बेहद विचलित करने वाली वास्तविकता’ करार दिया है। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को इस दिशा में कड़े कदम उठाने और मौजूदा कानूनों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने का निर्देश दिया है।
व्यवस्था पर गंभीर सवाल
न्यायमूर्ति की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बच्चों का शोषण न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि यह समाज के माथे पर एक गहरा कलंक भी है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि गरीबी, शिक्षा का अभाव और सुरक्षित सामाजिक ढांचे की कमी के कारण मासूम बच्चे मानव तस्करों के आसान शिकार बन जाते हैं।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
-कानूनी खामियां: न्यायालय ने माना कि हालांकि हमारे पास ‘पोक्सो’ (POCSO) और ‘अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम’ (ITPA) जैसे कानून हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका क्रियान्वयन अभी भी कमजोर है।
-बचाव और पुनर्वास: कोर्ट ने कहा कि केवल बच्चों को बचाना पर्याप्त नहीं है; उनके मानसिक स्वास्थ्य और समाज में उनके सम्मानजनक पुनर्वास के लिए एक ठोस नीति की आवश्यकता है।
-डिजिटल खतरा: इंटरनेट के बढ़ते दौर में बच्चों का ऑनलाइन यौन शोषण भी एक नई और भयावह चुनौती बनकर उभरा है।
सरकारों को कड़े निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (DGP) को निर्देश दिया है कि वे तस्करी के संवेदनशील इलाकों (Hotspots) की पहचान करें और मानव तस्करी रोधी इकाइयों (AHTU) को और अधिक सक्रिय करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस अपराध में शामिल लोगों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जानी चाहिए और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।