नई दिल्ली :- गोंडवाना विश्वविद्यालय में जल प्रबंधन विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें जल संरक्षण सिंचाई प्रबंधन और जल नीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। इस कार्यशाला का उद्देश्य जल संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देना और बदलते पर्यावरणीय हालात में प्रभावी जल प्रबंधन की रणनीतियों पर विचार करना रहा।
कार्यशाला में विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षाविदों जल विशेषज्ञों शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि जल संकट आज एक वैश्विक चुनौती बन चुका है और इसके समाधान के लिए नीति स्तर से लेकर जमीनी स्तर तक ठोस प्रयासों की जरूरत है। उन्होंने जल संरक्षण को सामाजिक आंदोलन बनाने पर जोर दिया।
सिंचाई प्रबंधन सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने आधुनिक सिंचाई तकनीकों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। बताया गया कि पारंपरिक तरीकों की तुलना में ये तकनीकें पानी की बचत के साथ फसल उत्पादन बढ़ाने में भी सहायक हैं। किसानों तक सही जानकारी और तकनीक पहुंचाना समय की मांग बताया गया।
जल नीति पर हुई चर्चा में वक्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकारों की मौजूदा नीतियों का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि जल नीति बनाते समय स्थानीय जरूरतों और क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। इसके साथ ही जल प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी को भी अहम बताया गया।
कार्यशाला के दौरान विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए जिनमें वर्षा जल संचयन भूजल संरक्षण और शहरी जल प्रबंधन जैसे विषय शामिल रहे। इन प्रस्तुतियों को विशेषज्ञों ने सराहा और उपयोगी सुझाव भी दिए।
समापन सत्र में यह निष्कर्ष निकाला गया कि जल प्रबंधन केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है बल्कि इसमें शिक्षण संस्थानों समाज और आम नागरिकों की समान भूमिका है। तीन दिवसीय यह कार्यशाला जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और भविष्य की नीति व योजनाओं के लिए एक सार्थक पहल साबित हुई।