नई दिल्ली :- देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली को लेकर एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली रेंज की नई परिभाषा को लेकर स्वतः संज्ञान लिया है और इस मामले पर आज सुनवाई करने का फैसला किया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन जजों की विशेष पीठ इस अहम पर्यावरणीय मुद्दे पर विचार करेगी। इस कदम के बाद पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों की उम्मीदें एक बार फिर जागी हैं।
दरअसल अरावली को लेकर जो नई परिभाषा सामने आई है उस पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस परिभाषा में 100 मीटर ऊंचाई को आधार बनाया गया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि केवल ऊंचाई को मानक माना गया तो अरावली का बड़ा हिस्सा इस दायरे से बाहर हो जाएगा। इससे खनन और निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है जो पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा।
अरावली न केवल जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है बल्कि यह उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन में भी बड़ी भूमिका निभाती है। यह क्षेत्र भूजल संरक्षण वायु शुद्धिकरण और मरुस्थलीकरण को रोकने में सहायक माना जाता है। ऐसे में इसकी सीमाओं को कमजोर करना आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति के मामलों में सख्त रुख अपनाता रहा है। इस बार स्वतः संज्ञान लेना इस बात का संकेत है कि अदालत इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से देख रही है। न्यायालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे।
आज होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। पर्यावरण संगठनों को उम्मीद है कि अदालत अरावली की व्यापक और वैज्ञानिक परिभाषा तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी। वहीं सरकार की ओर से भी अपना पक्ष रखा जाएगा।
कुल मिलाकर यह मामला केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है बल्कि यह प्रकृति और मानव भविष्य से जुड़ा सवाल है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।