Rare Diseases दिल्ली:- भारतीय फार्मा कंपनियां दुर्लभ बीमारियों के लिए दवाएं बनाने में हिचकिचाती हैं इसके कई कारण हैं। इनमें से एक प्रमुख कारण है उच्च अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) लागत, जो 100 मिलियन डॉलर से लेकर 1 बिलियन डॉलर तक हो सकती है। इसके अलावा, दुर्लभ बीमारियों के लिए दवाओं की मांग कम होती है जिससे कंपनियों को निवेश करने में हिचक होती है।
नियामक चुनौतियां
भारतीय फार्मा कंपनियों को नियामक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) द्वारा निर्धारित नियम और प्रक्रियाएं जटिल होती हैं जिससे दवाओं के अनुमोदन में देरी होती है। इसके अलावा, क्लीनिकल ट्राइलों के लिए आवश्यक डेटा और दस्तावेज़ीकरण भी एक बड़ी चुनौती है ।
आरएंडडी में निवेश की कमी
भारतीय फार्मा कंपनियां आरएंडडी में निवेश करने में हिचकिचाती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि दुर्लभ बीमारियों के लिए दवाओं की मांग कम होगी। इसके अलावा, आरएंडडी की लागत भी बहुत अधिक होती है जिससे कंपनियों को निवेश करने में हिचक होती है।
सरकारी समर्थन की कमी
भारतीय सरकार ने दुर्लभ बीमारियों के लिए दवाओं के विकास को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं लेकिन अभी भी सरकारी समर्थन की कमी है। सरकार को नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने और आरएंडडी में निवेश को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने होंगे।