नए साल पर दिखे कुछ शर्मसार कर देने वाले मंजर, महिलाओं ने भी किया नशे का सेवन

 

नई दिल्ली :- इकतीस दिसंबर की रात बेंगलुरु और दिल्ली से कई ऐसे वीडियो सामने आए जिन्होंने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया। इन वीडियो में कुछ लड़कियां और महिलाएं शराब के नशे में सड़क पर बेसुध हालत में पड़ी दिखाई दीं। कहीं लड़खड़ाती चाल तो कहीं होश खो चुकी स्थिति ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या हम सच में आज़ादी के सही अर्थ को समझ पा रहे हैं।

विज्ञान बताता है कि शराब का असर महिलाओं पर अपेक्षाकृत तेज और गहरा होता है। शरीर की बनावट और हार्मोनल संरचना के कारण शराब सीधे मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करती है जो निर्णय और संतुलन से जुड़े होते हैं। समान मात्रा में शराब पीने पर पुरुष की तुलना में महिला पर नशे का प्रभाव कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। यह कोई सामाजिक आरोप नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य है।

वीडियो में एक दृश्य ऐसा भी था जहां एक महिला सड़क पर पड़ी थी और उसके पास उसका छोटा बच्चा रोता हुआ नजर आ रहा था। महिला पूरी तरह बेहोश थी और दो पुलिसकर्मी केवल यह देख रहे थे कि कोई वाहन उसे कुचल न दे। पुलिस की स्थिति भी कठिन थी क्योंकि सामाजिक और कानूनी सीमाएं उन्हें सीधे हस्तक्षेप से रोकती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मेरी लाइफ मेरी मर्जी जैसे नारे और आधुनिक फेमिनिज्म के नाम पर चल रहे आंदोलनों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर दिया। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का संतुलन जरूरी होता है। जब आज़ादी का अर्थ आत्मसंयम खो देना बन जाए तो उसके परिणाम केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते बल्कि बच्चों और समाज पर भी असर डालते हैं।

यह समय है आत्ममंथन का। महिलाओं की सुरक्षा सम्मान और समान अधिकार जरूरी हैं लेकिन नशे को सशक्तिकरण समझना एक खतरनाक भ्रम है। नए साल के जश्न के बीच हमें यह तय करना होगा कि हम किस तरह की आज़ादी चाहते हैं और किस तरह का समाज आने वाली पीढ़ी को देना चाहते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *