नई दिल्ली :- साल 2026 की पहली तारीख ने भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोग इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग की शुरुआत मान रहे हैं तो कुछ इसे बांग्लादेश के लिए बढ़ती चुनौतियों का संकेत बता रहे हैं। जिस आशंका को लेकर बांग्लादेश लंबे समय से सतर्क था वह प्रक्रिया 1 जनवरी 2026 से औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी मानी जा रही है और यही वजह है कि इसे प्रतीकात्मक रूप से 365 दिन के काउंटडाउन के रूप में देखा जा रहा है।
असल में भारत की नीतियों में आए बदलाव और क्षेत्रीय रणनीति ने दक्षिण एशिया की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करना शुरू कर दिया है। आर्थिक गलियारों व्यापार समझौतों सीमा प्रबंधन और जल संसाधनों से जुड़े फैसलों का असर सीधे बांग्लादेश पर पड़ना तय माना जा रहा है। भारत जहां इसे क्षेत्रीय स्थिरता और विकास के लिए जरूरी कदम बता रहा है वहीं बांग्लादेश में इसे दबाव की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 दोनों देशों के रिश्तों के लिए निर्णायक साल बन सकता है। एक तरफ सहयोग के नए अवसर हैं तो दूसरी तरफ असहमति और आशंकाओं की लंबी सूची भी है। बांग्लादेश को डर है कि आर्थिक और कूटनीतिक निर्भरता बढ़ने से उसकी नीति निर्धारण की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। वहीं भारत का तर्क है कि मजबूत साझेदारी से ही पूरे क्षेत्र को फायदा होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि यह काउंटडाउन किसी टकराव की ओर जाता है या फिर मजबूती भरे सहयोग में बदलता है। इतना तय है कि 2026 की शुरुआत ने भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को यथास्थिति से बाहर निकाल दिया है और अब दोनों देशों को हर कदम बेहद सोच समझकर उठाना होगा।