2026 में पड़ोसी पहले नीति की कड़ी चुनौती

नई दिल्ली :- भारत की विदेश नीति में पड़ोसी पहले नीति को विशेष महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया में शांति सहयोग और स्थिरता को बढ़ावा देना रहा है। लेकिन साल 2026 इस नीति के लिए एक कठिन दौर साबित हो सकता है क्योंकि भारत के आसपास के कई देश गंभीर राजनीतिक और सामाजिक उथल पुथल से गुजर रहे हैं। इन हालात में संतुलन बनाए रखना भारत के कूटनीतिक कौशल की असली परीक्षा होगी।

 

बांग्लादेश में चुनावी अस्थिरता और राजनीति में बढ़ती कट्टरता भारत के लिए चिंता का विषय बन रही है। लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोगपूर्ण संबंध रहे हैं लेकिन आंतरिक राजनीतिक बदलावों का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ सकता है। सीमा सुरक्षा व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखते हुए भारत को बेहद सतर्कता से कदम उठाने होंगे।

 

पाकिस्तान की स्थिति भी भारत की नीति के लिए चुनौतीपूर्ण है। वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोर स्थिति और सेना का बढ़ता प्रभाव क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बना हुआ है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह सुरक्षा चिंताओं से समझौता किए बिना अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाए।

 

नेपाल में युवाओं के बीच बढ़ता असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता भी भारत के लिए नई चुनौती पेश कर रही है। नेपाल के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं लेकिन बदलती सामाजिक अपेक्षाएं नए तरह के संवाद की मांग करती हैं। भारत को विकास सहयोग और जन संपर्क के जरिए भरोसा मजबूत करना होगा।

 

इन सभी परिस्थितियों में भारत की पड़ोसी पहले नीति को लचीला और व्यावहारिक बनाना जरूरी है। केवल कूटनीतिक बयान नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर सहयोग और संवाद की जरूरत होगी। 2026 यह तय करेगा कि भारत क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका को कितनी कुशलता से निभा पाता है और अपने पड़ोस में स्थिरता व विश्वास कायम रख पाता है।

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