वाशिंगटन (अमेरिका):- वेनेज़ुएला के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई पर भारत की अपेक्षाकृत चुप्पी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है खासकर तब जब मलेशिया और कुछ अन्य देशों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया। इसके पीछे कई कूटनीतिक और रणनीतिक कारण माने जाते हैं जिन्हें समझना जरूरी है।
सबसे पहला कारण भारत की संतुलित विदेश नीति है। भारत परंपरागत रूप से किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद में सीधा पक्ष लेने से बचता रहा है खासकर जब मामला अमेरिका जैसे प्रभावशाली देश से जुड़ा हो। भारत अक्सर संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की बात करता है और सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय कूटनीतिक चैनलों के जरिए अपनी राय रखना पसंद करता है।
दूसरा बड़ा कारण भारत और अमेरिका के बीच मजबूत होते रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं। रक्षा व्यापार तकनीक सहयोग और इंडो पैसिफिक क्षेत्र में साझेदारी के चलते भारत अमेरिका के साथ टकराव से बचना चाहता है। ऐसे में वेनेज़ुएला मुद्दे पर खुलकर विरोध करना भारत के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ माना जा सकता है।
तीसरा पहलू ऊर्जा और व्यापार से जुड़ा है। भले ही भारत पहले वेनेज़ुएला से तेल आयात करता रहा हो लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह आयात लगभग बंद हो चुका है। मौजूदा हालात में भारत की प्रत्यक्ष आर्थिक हिस्सेदारी सीमित है जिससे इस मुद्दे पर मुखर होने की जरूरत भी कम हो जाती है।
चौथा कारण भारत की बहुपक्षीय कूटनीति है। भारत अक्सर संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर संप्रभुता और हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत की बात करता है लेकिन किसी एक देश को सीधे निशाना बनाकर बयान देने से बचता है। भारत का रुख आमतौर पर सिद्धांतों तक सीमित रहता है न कि किसी खास देश के समर्थन या विरोध तक।
मलेशिया जैसे देशों की स्थिति अलग है जहां घरेलू राजनीति और पश्चिम विरोधी रुख अधिक मुखर रहता है। भारत की प्राथमिकता फिलहाल वैश्विक संतुलन बनाए रखना और अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना है। इसी वजह से वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के खिलाफ भारत ने खुलकर बयान देने के बजाय संयमित और कूटनीतिक रास्ता चुना है।