नई दिल्ली :- भारत में आवारा कुत्तों की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर सुनवाई कर रहा है और विशेष रूप से स्कूलों और अस्पतालों में उनकी मौजूदगी को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। आंकड़ों के अनुसार पिछले साल 37 लाख लोग आवारा कुत्तों के काटने का शिकार बने और 54 लोगों की इस कारण मौत हो गई। यह स्थिति स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों के लिहाज से गंभीर मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ने से न केवल लोगों की जान को खतरा है बल्कि शहरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और भी अधिक है। स्कूलों और अस्पतालों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी से सुरक्षा और साफ-सफाई के मामले जटिल हो गए हैं।
सरकारी एजेंसियां और नगर निगम आवारा कुत्तों की समस्या को नियंत्रित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। रैबिज और अन्य बीमारियों से बचाव के लिए वैक्सीनेशन और शेल्टर घर बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का स्थायी समाधान केवल निवारक उपायों और जागरूकता के जरिए ही संभव है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने और सुरक्षित प्रबंधन के लिए प्रभावी योजना तैयार की जाए। इसमें कैच टैग और रिहैबिलिटेशन के साथ वैक्सीनेशन का विशेष ध्यान रखा जाए।
नागरिकों से भी अपील की गई है कि वे आवारा कुत्तों के साथ सहानुभूति रखें और उन्हें नुकसान पहुंचाने के बजाय सुरक्षित शेल्टर मुहैया कराने में सहयोग करें। इस मामले में सरकार और नागरिक मिलकर ही समस्या का स्थायी समाधान कर सकते हैं।