लोहड़ी की अग्नि और रेवड़ी फुल्ले की परंपरा का गहरा सांस्कृतिक अर्थ

चंडीगढ़ (पंजाब):- लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रमुख लोकपर्व है जिसे खास तौर पर पंजाब हरियाणा दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सर्दियों के अंत और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। लोहड़ी केवल गीत संगीत और नृत्य तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

 

लोहड़ी की सबसे अहम रस्म अग्नि प्रज्वलन है। शाम होते ही लोग खुले स्थान पर आग जलाते हैं और उसके चारों ओर एकत्र होकर परिक्रमा करते हैं। इसी दौरान अग्नि में रेवड़ी फुल्ले मूंगफली तिल और गुड़ अर्पित किए जाते हैं। यह परंपरा प्रकृति और अग्नि देव को धन्यवाद देने का प्रतीक है। माना जाता है कि आग में डाले जाने वाले ये पदार्थ धरती की उपज हैं जो अच्छी फसल और समृद्धि की कामना के साथ अर्पित किए जाते हैं।

 

रेवड़ी और फुल्ले का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये सर्दियों में शरीर को ऊर्जा देने वाले खाद्य पदार्थ हैं। गुड़ और तिल को आयुर्वेद में स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। लोहड़ी के समय इनका सेवन ठंड से बचाव और नई ऊर्जा का संकेत माना जाता है। यह पर्व सामूहिकता और बांटकर खाने की भावना को भी मजबूत करता है।

 

लोहड़ी का संबंध लोककथा दुल्ला भट्टी से भी जुड़ा है जिसे गरीबों का मसीहा माना जाता था। कहा जाता है कि दुल्ला भट्टी ने कई जरूरतमंद लड़कियों के विवाह कराए और समाज में न्याय की भावना को बढ़ावा दिया। लोहड़ी के गीतों में आज भी उसका जिक्र मिलता है।

 

इस तरह लोहड़ी केवल एक उत्सव नहीं बल्कि प्रकृति संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का संगम है। अग्नि में रेवड़ी फुल्ले डालने की रस्म हमें कृतज्ञता आपसी भाईचारे और नई शुरुआत का संदेश देती है। यही वजह है कि लोहड़ी हर साल लोगों के दिलों में खास स्थान बनाए रखती है।

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