वाशिंगटन (अमेरिका):- डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बोर्ड ऑफ पीस के गठन का एलान करके अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उनका कहना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर गाजा युद्ध समेत दुनिया के अन्य बड़े विवादों को सुलझाने की दिशा में काम करेगा। ट्रंप के इस कदम को कुछ लोग शांति की पहल मान रहे हैं तो कुछ इसे केवल राजनीतिक रणनीति बता रहे हैं।
बोर्ड ऑफ पीस की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव झेल रही है। मध्य पूर्व में युद्ध की आग अभी पूरी तरह शांत नहीं हुई है। यूक्रेन संकट और एशिया प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती खींचतान भी वैश्विक चिंता का विषय बनी हुई है। ट्रंप का दावा है कि उनका अनुभव और अमेरिका की ताकत शांति प्रक्रिया को नई गति दे सकती है। हालांकि आलोचकों का मानना है कि शांति केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि भरोसे और अंतरराष्ट्रीय सहमति से आती है।
इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड और कनाडा को अमेरिकी क्षेत्र बताने वाले पुराने बयानों ने फिर से सुर्खियां बटोरी हैं। इन दावों को लेकर कई देशों में नाराजगी भी देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार किसी भी संप्रभु देश या क्षेत्र पर इस तरह का दावा गंभीर सवाल खड़े करता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बयान वैश्विक तनाव को बढ़ा सकते हैं और कूटनीतिक रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
दूसरी ओर ट्रंप समर्थक इसे मजबूत नेतृत्व की छवि के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि ट्रंप सिर्फ अमेरिका के हितों को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं। लेकिन आलोचक इसे आक्रामक सोच और शक्ति प्रदर्शन की राजनीति मानते हैं।
कुल मिलाकर बोर्ड ऑफ पीस की पहल और क्षेत्रीय दावों को लेकर उठी यह बहस दिखाती है कि वैश्विक राजनीति कितनी जटिल हो चुकी है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह बोर्ड सच में शांति का रास्ता खोलता है या सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।