मिट्टी में मिला था ‘अशोक स्तंभ’, नेहरू-पटेल ने इसे ही क्यों बनाया देश की शान; कैसे तय हुए थे नाम, नोट और राष्ट्रीय प्रतीक?

नई दिल्ली :- 26 जनवरी 1950 का दिन भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनकर आया। इसी दिन देश ने गणतंत्र का दर्जा हासिल किया और ब्रिटिश शासन की पहचान माने जाने वाले प्रतीकों को पीछे छोड़ दिया गया। आज जिन राष्ट्रीय प्रतीकों पर हमें गर्व है उनके पीछे गहरी सोच इतिहास और सांस्कृतिक चेतना जुड़ी हुई है।

 

अशोक स्तंभ को भारत का राष्ट्रीय प्रतीक बनाने का फैसला बेहद प्रतीकात्मक था। यह स्तंभ सम्राट अशोक के शासनकाल से जुड़ा है जो अहिंसा धर्म और नैतिक शासन का प्रतीक माना जाता है। यह स्तंभ सारनाथ में जमीन के भीतर दबा मिला था जिसे बाद में पुरातत्वविदों ने खोज निकाला। जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल चाहते थे कि नया भारत किसी साम्राज्यवादी ताकत से नहीं बल्कि अपनी प्राचीन सभ्यता से प्रेरणा ले। अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष साहस शक्ति और आत्मविश्वास का संदेश देता है।

 

आजादी के बाद सबसे पहले सेना से रॉयल शब्द हटाया गया ताकि भारतीय सेना पूरी तरह से स्वतंत्र पहचान के साथ खड़ी हो सके। इसके बाद भारतीय करेंसी में बड़ा बदलाव किया गया। पहले नोटों और सिक्कों पर ब्रिटिश महारानी की तस्वीर होती थी जिसे हटाकर भारतीय प्रतीकों को जगह दी गई। यह कदम मानसिक गुलामी से मुक्ति का संकेत था।

 

देश का नाम भारत और इंडिया दोनों को संविधान में शामिल किया गया। भारत नाम प्राचीन परंपरा और संस्कृति से जुड़ा है जबकि इंडिया आधुनिक पहचान का प्रतीक बना। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को अपनाया गया जिसमें केसरिया सफेद और हरे रंग के साथ अशोक चक्र को केंद्र में रखा गया।

 

राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान का चयन भी सोच समझकर किया गया। वंदे मातरम और जन गण मन दोनों ही देश की आत्मा को व्यक्त करते हैं। राष्ट्रीय पशु पक्षी फूल और वृक्ष का चयन भारत की विविधता और प्रकृति प्रेम को दर्शाता है।

इन सभी प्रतीकों का उद्देश्य एक ऐसा भारत गढ़ना था जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो और भविष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ बढ़े। आज ये राष्ट्रीय प्रतीक सिर्फ पहचान नहीं बल्कि देश की आत्मा बन चुके हैं।

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