नई दिल्ली :- भारत को वीटो पावर मिलने की चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं और इसी को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल का माहौल है। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह दावा किया जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता अब ज्यादा दूर नहीं है। इसी संभावित बदलाव को लेकर पाकिस्तान की चिंता और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कथित असहजता को जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के साथ साथ तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और मजबूत सैन्य क्षमता के कारण उसे वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में स्थायी भूमिका मिलनी चाहिए। कई बड़े देश भी समय समय पर यह मान चुके हैं कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर आधारित है जो आज के दौर से मेल नहीं खाती।
पाकिस्तान भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत को लेकर पहले से ही असहज रहा है। अगर भारत को सुरक्षा परिषद में वीटो पावर मिलती है तो क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि वहां की राजनीति और मीडिया में भारत की संभावित स्थायी सदस्यता को लेकर घबराहट दिखाई देती है।
वहीं अमेरिका के संदर्भ में यह कहा जा रहा है कि सत्ता संतुलन में बदलाव से पुरानी वैश्विक शक्तियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है। हालांकि यह भी सच है कि अभी तक किसी भी आधिकारिक मंच पर भारत को वीटो पावर दिए जाने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है जिसमें मौजूदा स्थायी सदस्यों की सहमति जरूरी होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का कद वैश्विक मंच पर लगातार बढ़ रहा है। चाहे जी ट्वेंटी की अध्यक्षता हो या अंतरराष्ट्रीय संकटों पर भारत की संतुलित भूमिका दुनिया उसे गंभीरता से सुन रही है। वीटो पावर मिले या न मिले लेकिन इतना तय है कि भारत अब केवल सुनने वाला नहीं बल्कि दिशा तय करने वाला देश बनता जा रहा है। यही बदलता भारत दुनिया की राजनीति में नई बहसों को जन्म दे रहा है।