नई दिल्ली :- भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति देशहित के सिद्धांत पर आधारित है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव को दरकिनार करते हुए भारत ने अपनी स्वतंत्र और संतुलित ऊर्जा रणनीति पर मजबूती से कायम रहने का संकेत दिया है। यह रुख दिखाता है कि वैश्विक मंच पर भारत अब अपने फैसले खुद लेने में पूरी तरह सक्षम और आत्मनिर्भर है।
ऊर्जा जरूरतों के मामले में भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में शामिल है। ऐसे में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर भारत हमेशा विविध स्रोतों पर निर्भर रहने की नीति अपनाता रहा है। भारत का कहना है कि सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति देश की आर्थिक वृद्धि और आम जनता के हित से सीधे जुड़ी हुई है। किसी एक देश या दबाव में आकर नीति बदलना भारत के लिए व्यावहारिक नहीं है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों से तय होती है। चाहे अमेरिका हो या कोई अन्य ताकतवर देश भारत अपने नागरिकों की जरूरतों और उद्योगों की मांग को सर्वोपरि रखेगा। यही कारण है कि भारत ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के साथ साथ पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों पर भी संतुलन बनाए रखा है।
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी बड़े कदम उठाए हैं। सोलर और विंड एनर्जी में निवेश बढ़ाकर देश ने यह दिखाया है कि वह भविष्य की जरूरतों को लेकर गंभीर है। इसके बावजूद फिलहाल तेल और गैस जैसे संसाधनों की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। भारत इसी व्यावहारिक सोच के साथ आगे बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का यह नेशन फर्स्ट रुख वैश्विक राजनीति में उसकी मजबूत स्थिति को दर्शाता है। अब भारत न सिर्फ सुनता है बल्कि अपने हितों के अनुसार जवाब भी देता है। ऊर्जा नीति पर लिया गया यह फैसला आने वाले समय में भारत की आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक स्वतंत्रता को और मजबूत करने वाला साबित हो सकता है।