नई दिल्ली :- देश में स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी तेजी से उभर रही है। मेडिकल कचरे का गलत निस्तारण अब एक बड़ा पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार देश के अस्पतालों से हर दिन करीब सात सौ टन बायो मेडिकल वेस्ट निकलता है। यदि इसका सही तरीके से प्रबंधन न हो तो यह आम लोगों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में स्थिति और भी चिंताजनक है। घरों और छोटे स्वास्थ्य केंद्रों से निकलने वाली बची हुई और एक्सपायर दवाएं अक्सर कचरे में फेंक दी जाती हैं। यह कचरा जमीन में मिलकर भूजल को प्रदूषित कर रहा है। यही नहीं यह गंदा पानी यमुना जैसी नदियों तक पहुंच रहा है जिससे जल स्रोत जहरीले होते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल वेस्ट में मौजूद रसायन और एंटीबायोटिक अवशेष खतरनाक बैक्टीरिया को जन्म दे रहे हैं। इससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में सामान्य संक्रमण भी दवाओं से ठीक नहीं हो पाएंगे। यह समस्या धीरे धीरे एक साइलेंट महामारी का रूप ले सकती है।
अस्पतालों में उपयोग होने वाली सुइयां पट्टियां दवाइयों के पैकेट और अन्य जैविक कचरा यदि खुले में फेंका जाए तो यह सीधे इंसानों और जानवरों के संपर्क में आता है। इससे संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कचरा बीनने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं।
सरकार ने बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए नियम बनाए हैं लेकिन जमीनी स्तर पर इनका पालन पूरी तरह नहीं हो पा रहा है। छोटे क्लीनिक और घरों में जागरूकता की कमी साफ नजर आती है। जरूरत है कि मेडिकल कचरे के सुरक्षित निस्तारण को लेकर सख्ती और जनजागरूकता दोनों बढ़ाई जाए।
यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों की सेहत पर पड़ेगा। मेडिकल कचरा सिर्फ गंदगी नहीं बल्कि एक गंभीर चेतावनी है जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।