Judicial work नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक कार्य में संवेदनशीलता और दया की भावना को बढ़ावा देने के लिए एक समिति का गठन किया है। यह समिति न्यायाधीशों को संवेदनशील और दयालु बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगी खासकर जब वे यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों से निपट रहे हों। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने यह निर्णय लिया है। समिति का नेतृत्व न्यायाधीश अनिरुद्ध बोस करेंगे, जो नेशनल जूडिशियल अकेडमी के निदेशक हैं। समिति में चार अन्य विशेषज्ञ भी शामिल होंगे जिनमें अधिवक्ता, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद उठाया है, जिसमें एक नाबालिग लड़की के साथ यौन हमले के मामले में आरोपी को दोषी नहीं ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को “असंवेदनशील” और “अमानवीय” बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रणाली को संवेदनशील और दयालु बनाने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों को प्रशिक्षित किया जाए। समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
समिति के कार्य
– न्यायाधीशों को संवेदनशील और दयालु बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना
– यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों के व्यवहार को बेहतर बनाने के लिए सिफारिशें करना
– न्यायिक प्रणाली में संवेदनशीलता और दया की भावना को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाना
सुप्रीम कोर्ट का कहना है
– “न्यायिक प्रणाली को संवेदनशील और दयालु बनाने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों को प्रशिक्षित किया जाए।”
– “हमारा उद्देश्य न्यायिक प्रणाली में संवेदनशीलता और दया की भावना को बढ़ावा देना है।”
– “न्यायाधीशों को संवेदनशील और दयालु बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना आवश्यक है।”