बीजिंग (चीन):- चीन की सैन्य ताकत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस शुरू हो गई है। हाल के विश्लेषणों और रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी अंदरूनी चुनौतियों और संरचनात्मक कमजोरियों का सामना कर रही है जिससे किसी बड़े युद्ध की स्थिति में जोखिम बढ़ सकता है। इन चर्चाओं के केंद्र में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सैन्य नीतियां भी आ गई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में सेना के आधुनिकीकरण पर भारी निवेश के बावजूद नेतृत्व संरचना और अनुभव की कमी बड़ी समस्या बन सकती है। चीन ने तकनीक और हथियारों के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है लेकिन वास्तविक युद्ध अनुभव की कमी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि लंबे समय से किसी बड़े युद्ध में शामिल न होने के कारण सेना की वास्तविक क्षमता का परीक्षण नहीं हुआ है।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए अभियानों ने सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया जिससे कमांड सिस्टम में अस्थिरता पैदा हुई। हालांकि सरकार इसे सुधार प्रक्रिया का हिस्सा बताती है लेकिन कुछ रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इससे निर्णय लेने की गति प्रभावित हो सकती है।
ताइवान मुद्दा भी इस चर्चा का अहम हिस्सा बना हुआ है। यदि भविष्य में ताइवान को लेकर सैन्य टकराव होता है तो चीन को जटिल समुद्री और हवाई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिमी देशों के विश्लेषकों का कहना है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं बल्कि प्रशिक्षण समन्वय और मनोबल से भी जीते जाते हैं।
हालांकि चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत बताता रहा है और बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास भी करता है। इसके बावजूद वैश्विक रणनीतिक समुदाय में यह सवाल उठ रहा है कि क्या तेज आधुनिकीकरण के बीच संगठनात्मक मजबूती उतनी ही मजबूत बनी हुई है या नहीं। आने वाले वर्षों में एशिया प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति काफी हद तक इसी संतुलन पर निर्भर करेगी।