सोनभद्र (उत्तर प्रदेश):- देश तेजी से आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ रहा है और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत करने की बात लगातार कही जा रही है। चमकती सड़कों ऊंची इमारतों और डिजिटल विकास की कहानियों के बीच एक सच्चाई ऐसी भी है जो अक्सर खबरों की भीड़ में दब जाती है। यह सच्चाई उन श्रमिकों की है जो रोज अपनी जान जोखिम में डालकर व्यवस्था को चलाते हैं।
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में संविदा लाइनमैन संतोष कुमार की मौत इसी कठोर वास्तविकता को सामने लाती है। वह नया ट्रांसफार्मर लगाने के लिए बिजली के खंभे पर चढ़े थे। काम के दौरान अचानक हाई वोल्टेज सप्लाई शुरू हो गई और उन्हें तेज करंट का झटका लगा। संतोष खंभे से चिपक गए और उनका शरीर बुरी तरह झुलस गया। साथी कर्मचारियों ने तुरंत शट डाउन लेने की कोशिश की और उन्हें नीचे उतारा गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
यह घटना केवल एक हादसा नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरियों का प्रतीक है। देश के कई हिस्सों में संविदा कर्मचारी बिना उचित सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं। रबर के जूते सुरक्षा दस्ताने और हेलमेट जैसी बुनियादी चीजें भी कई बार उपलब्ध नहीं होतीं। मामूली वेतन पर काम करने वाले ये कर्मचारी हर दिन जोखिम उठाते हैं क्योंकि उनके पास रोजगार का दूसरा विकल्प नहीं होता।
आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ केवल आंकड़ों की वृद्धि नहीं बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान भी है। जब तक श्रमिकों को सुरक्षित कार्य वातावरण नहीं मिलेगा तब तक विकास अधूरा रहेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि बिजली विभाग सहित सभी तकनीकी सेवाओं में सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू करना जरूरी है ताकि किसी परिवार को अपने कमाने वाले सदस्य को इस तरह न खोना पड़े।
सवाल यह नहीं कि देश कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है बल्कि यह है कि उस प्रगति में आम श्रमिक की जिंदगी कितनी सुरक्षित है। यही सवाल भविष्य की दिशा तय करेगा।