Justice Unplugged : “पुराने कानून, नई चुनौतियां”: अश्लीलता पर वरिष्ठ अधिवक्ता का बड़ा बयान

Justice Unplugged नई दिल्ली: ‘जस्टिस अनप्लग्ड 2026’ के जीवंत मंच पर कानूनी जगत के दिग्गजों ने समकालीन सामाजिक चुनौतियों और कानून की भूमिका पर गहन चर्चा की। इस कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने डिजिटल युग में बढ़ती अश्लीलता और उसे नियंत्रित करने के लिए कानूनी ढांचे पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान कानूनों में ही पर्याप्त शक्ति निहित है।

वर्तमान कानूनों की सक्षमता पर बल

शंकरनारायणन ने अपने संबोधन में इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों पर मौजूद सामग्री को नियंत्रित करने के लिए सरकार को नए या अधिक कठोर नियमों की आवश्यकता है। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के मौजूदा प्रावधान इतने व्यापक हैं कि वे किसी भी प्रकार की अभद्र या अश्लील सामग्री से निपटने में सक्षम हैं उनके अनुसार समस्या नियमों के अभाव में नहीं, बल्कि उनके सटीक क्रियान्वयन में है। उन्होंने कहा कि “नियमों की संख्या बढ़ाना समाधान नहीं है बल्कि मौजूदा व्यवस्था को आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल बिठाने की आवश्यकता है।”

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मर्यादा का संतुलन

चर्चा के दौरान उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादा के बीच के सूक्ष्म अंतर को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि कला और अश्लीलता के बीच की रेखा अक्सर धुंधली हो जाती है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अभिव्यक्ति के अधिकार पर अंकुश लगाने के लिए हर दिन नए प्रतिबंध थोपें।

उनके भाषण के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार रहे:

पारिभाषिक स्पष्टता: अश्लीलता की परिभाषा को लेकर न्यायपालिका के पिछले निर्णयों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ‘सामुदायिक मानकों’ को समझना जरूरी है।

प्रौद्योगिकी का उपयोग: उन्होंने सुझाव दिया कि कानून बनाने के बजाय, तकनीक का उपयोग करके अश्लील सामग्री की पहचान और उसे हटाने की प्रक्रिया को तीव्र किया जाना चाहिए।

न्यायिक सक्रियता: उन्होंने न्यायालयों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला, जो समय-समय पर इन कानूनों की व्याख्या करके समाज को नई दिशा देते रहे हैं।

डिजिटल युग की चुनौतियां

शंकरनारायणन ने स्वीकार किया कि कृत्रिम मेधा और गहरे नकली (डीपफेक) वीडियो जैसे नए खतरों ने दृश्य को जटिल बना दिया है। हालांकि उन्होंने फिर से इसी बात पर बल दिया कि इन अपराधों का मूल स्वरूप वही है जो दशकों पहले था। केवल माध्यम बदला है, अपराध की प्रकृति नहीं। इसलिए बुनियादी कानूनों में संशोधन के बजाय उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित करना अधिक फलदायी होगा।उन्होंने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यदि हम नए-नए नियम बनाते रहेंगे तो यह केवल नौकरशाही की जटिलता को बढ़ाएगा और आम नागरिकों के अधिकारों के लिए बाधा बनेगा। इसके विपरीत, यदि जांच एजेंसियां और पुलिस बल मौजूदा कानूनों के तहत त्वरित कार्रवाई करें, तो अपराधियों में कानून का भय व्याप्त होगा।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

गोपाल शंकरनारायणन के इस वक्तव्य ने कानूनी विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। उनका यह दृष्टिकोण उदारवादी कानूनी सोच का प्रतिनिधित्व करता है, जो राज्य के हस्तक्षेप को कम करने और दक्षता बढ़ाने की वकालत करता है।

‘जस्टिस अनप्लग्ड 2026’ का यह सत्र इस संदेश के साथ समाप्त हुआ कि समाज को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है, बल्कि यह कानून के सही उपयोग और नागरिकों की जागरूकता का भी विषय है। नए नियमों की खोज करने के बजाय, हमें अपनी न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

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