VIP Entitlement in India Law : गरीब का ठेला उलट जाता है, और रईसों की लैंबोर्गिनी ‘रेड कार्पेट’ पर छूट जाती है

VIP Entitlement in India Law/कानपुर:- उत्तर प्रदेश के कानपुर में न्याय की तराजू एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जिस तेज रफ्तार लैंबोर्गिनी ने वीआईपी रोड पर कोहराम मचाते हुए 6 लोगों की जिंदगी को मौत के मुहाने पर धकेल दिया था, उसे छुड़ाने के लिए प्रशासन और रसूखदारों ने आधी रात को ‘विशेष सक्रियता’ दिखाई। शुक्रवार देर रात करीब 12:30 बजे ग्वालटोली थाने से इस लग्जरी कार को ट्रक पर लादकर रवाना किया गया, जिसे लेकर अब प्रदेश की सियासत और जनता के बीच तीखी बहस छिड़ गई है।

पैसा और पहुंच: ‘होम डिलीवरी’ जैसा न्याय?

7 फरवरी को हुए इस भीषण हादसे में तंबाकू कारोबारी केके मिश्रा के बेटे शिवम मिश्रा का नाम सामने आया था। आरोप है कि तेज रफ्तार कार ने एक ऑटो और मोटरसाइकिल को टक्कर मारी, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्य आरोपी को गिरफ्तारी के महज कुछ ही घंटों बाद जमानत मिल गई। अब कोर्ट के आदेश पर 8.30 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड तोड़ जमानत राशि (स्योरिटी बॉन्ड) जमा कर कार को भी मुक्त करा लिया गया है।

सुशासन या ‘रसूख’ का मॉडल?

विपक्ष और सोशल मीडिया पर आम जनता इस कार्रवाई को ‘गरीब बनाम अमीर’ की जंग बता रही है। सवाल उठ रहे हैं कि:

क्या एक आम आदमी का ठेला पलटने पर पुलिस इसी ‘फुर्ती’ से आधी रात को मदद करती है?

क्या करोड़ों का बेल बॉन्ड उन 6 घायलों के दर्द की भरपाई कर सकता है जो आज भी अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं?

क्या यह वही ‘सुशासन’ है जहां न्याय की गति जेब के वजन से तय होती है?

विपक्ष का हमला

राजनीतिक गलियारों में इस घटना को लेकर भाजपा सरकार की घेराबंदी शुरू हो गई है। आलोचकों का कहना है कि प्रदेश में न्याय अब ‘होम डिलीवरी’ की तरह हो गया है—बस आपके पास रसूख होना चाहिए। आधी रात को कार का रिलीज होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करता है।

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