Backchannel diplomacy/चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर पैदा हुआ गतिरोध ‘बैकचैनल डिप्लोमेसी’ (पर्दे के पीछे की कूटनीति) के जरिए सुलझता नजर आ रहा है। मंगलवार (3 मार्च 2026) को कांग्रेस के दिग्गज नेता पी. चिदंबरम और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बीच हुई आमने-सामने की मुलाकात ने गठबंधन टूटने की आशंकाओं पर विराम लगा दिया है।
तनाव की वजह: ’25 सीटों’ का अड़ियल रुख
पिछले कुछ दिनों से दोनों दलों के बीच रिश्तों में खटास देखी जा रही थी। द्रमुक ने कांग्रेस को स्पष्ट कर दिया था कि वह 25 विधानसभा सीटों और एक राज्यसभा सीट से अधिक देने के पक्ष में नहीं है। वहीं कांग्रेस आलाकमान कम से कम 40 सीटों और दो राज्यसभा सीटों की मांग पर अड़ा था। कांग्रेस के तमिलनाडु प्रभारी गिरीश चोडनकर ने DMK के इस प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” करार दिया था, जिससे बातचीत ठप हो गई थी।
इन ‘संकटमोचकों’ ने निभाई अहम भूमिका
जब गठबंधन टूटने के कगार पर था, तब पर्दे के पीछे से कुछ प्रमुख चेहरों ने मोर्चा संभाला:
पी. चिदंबरम और कार्ति चिदंबरम: दिल्ली और चेन्नई के बीच बातचीत का सेतु बनाने के लिए पी. चिदंबरम को विशेष दूत के रूप में तैनात किया गया। उन्होंने शर्त रखी कि वे सीधे एम.के. स्टालिन से बात करेंगे।
कनिमोझी करुणानिधि: DMK की ओर से सांसद कनिमोझी ने दिल्ली में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ अनौपचारिक बातचीत जारी रखी, ताकि वैचारिक मतभेदों को कम किया जा सके।
सोनिया गांधी का हस्तक्षेप: सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी शुरू से ही DMK के साथ गठबंधन जारी रखने के पक्ष में थीं, जिसने कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के कड़े रुख को नरम करने में मदद की।
कैसे बनी बात? प्रमुख मोड़
सोमवार (2 मार्च) की रात गठबंधन के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हुई। कांग्रेस महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल ने तमिलनाडु के कांग्रेस विधायकों से फोन पर बात की। अधिकांश विधायकों ने राय दी कि अकेले चुनाव लड़ने या किसी नई पार्टी (जैसे विजय की TVK) के साथ जाने के बजाय DMK के साथ रहना ही समझदारी है। इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी मांग को थोड़ा कम किया और DMK ने भी अपने ‘टेक इट या लीव इट’ (मानो या न मानो) वाले रुख में लचीलापन दिखाया। संभावना जताई जा रही है कि DMK सीटों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी कर सकती है।
समय की कमी और राज्यसभा का गणित
इस समझौते में जल्दबाजी की एक बड़ी वजह राज्यसभा चुनाव है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 5 मार्च है। DMK चाहती थी कि विधानसभा सीटों का बंटवारा 3 मार्च तक फाइनल हो जाए ताकि राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जा सकें। यदि कांग्रेस के साथ बात नहीं बनती, तो DMK अपने दम पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में थी। “गठबंधन में बातचीत होना सामान्य है। हर दल अपनी ताकत के हिसाब से मांग करता है, लेकिन अंततः हमारा साझा लक्ष्य सांप्रदायिक ताकतों को हराना है।” — के. सेल्वापेरुन्थागई (TNCC अध्यक्ष)