Hearing disorders/मैसूरु (कर्नाटक): विश्व श्रवण दिवस (3 मार्च 2026) के अवसर पर ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग (AIISH) ने मैसूरु जिला प्रशासन के साथ मिलकर एक महत्वाकांक्षी स्कूल-आधारित मूल्यांकन कार्यक्रम ‘सारथी’ (SAARTHI) लॉन्च किया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक स्कूली बच्चों में सुनने की अक्षमता, भाषा और बोलने संबंधी विकारों की शुरुआती पहचान करना और उन्हें समय पर उपचार प्रदान करना है।
‘सारथी’ पहल: क्या है खास?
‘सारथी’ (School-based Assessment and Action for Referral, Therapy, and Rehabilitation) नाम की यह परियोजना अगले एक साल (मार्च 2026 से मार्च 2027) तक पूरे जिले में चलाई जाएगी।
लक्षित समूह: यह कार्यक्रम मुख्य रूप से 3 से 10 वर्ष की आयु के बच्चों पर केंद्रित है। इसमें जिले के सभी आंगनवाड़ी केंद्र और प्राथमिक स्कूल शामिल होंगे।
शिक्षकों की भूमिका: इस अभियान के तहत लगभग 1,700 शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। ये शिक्षक डिजिटल टूल्स और चेकलिस्ट की मदद से कक्षा में बच्चों की प्रारंभिक स्क्रीनिंग करेंगे।
विशेषज्ञ जांच: जिन बच्चों में समस्या के लक्षण पाए जाएंगे, उनकी जांच एआईआईएसएच के विशेषज्ञ ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट द्वारा सीधे स्कूलों में जाकर की जाएगी।
शुरुआती पहचान क्यों है जरूरी?
हालिया शोध और विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में सुनने की समस्या का असर केवल उनके कानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उनके पूरे भविष्य को प्रभावित करता है।
शैक्षणिक प्रदर्शन: सुनने में कठिनाई होने पर बच्चा शिक्षक की बात ठीक से नहीं समझ पाता, जिससे वह पढ़ाई में पिछड़ने लगता है।
सामाजिक विकास: संवाद की कमी के कारण ऐसे बच्चे अक्सर अकेलेपन और हीन भावना का शिकार हो जाते हैं।
समय पर इलाज: 14% से अधिक स्कूली बच्चों में कान से जुड़ी समस्याएं पाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश (जैसे इन्फेक्शन या वैक्स) इलाज योग्य होती हैं। समय पर पहचान होने से स्थायी बहरेपन को रोका जा सकता है।
विश्व श्रवण दिवस 2026 की थीम के अनुरूप कदम
इस वर्ष विश्व श्रवण दिवस की वैश्विक थीम “से समुदायों से लेकर कक्षाओं तक: सभी बच्चों के लिए श्रवण देखभाल” (समुदायों से कक्षाओं तक: सभी बच्चों के लिए श्रवण देखभाल) रखी गई है। मैसूरु में शुरू हुई यह ‘सारथी’ पहल इसी वैश्विक लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
एआईआईएसएच की निदेशक डॉ. एम. पुष्पवती ने बताया कि यह कार्यक्रम केंद्र सरकार के ‘राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम’ (RBSK) और ‘बहरापन निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम’ (NPPCD) के साथ समन्वय बिठाकर चलाया जा रहा है।
प्रशासन और संस्थान का साझा प्रयास
एआईआईएसएच और जिला प्रशासन के बीच एक आधिकारिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। जिला प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि स्क्रीनिंग के बाद जिन बच्चों को सर्जरी (जैसे कॉक्लियर इंप्लांट) या हियरिंग एड की जरूरत है, उन्हें सरकारी योजनाओं के तहत मुफ्त या रियायती दरों पर सहायता मिले।”हमारा लक्ष्य है कि मैसूरु का कोई भी बच्चा सुनने की अक्षमता के कारण अपनी शिक्षा या सपनों से समझौता न करे। यह पहल स्वास्थ्य और शिक्षा के बीच एक मजबूत सेतु का काम करेगी।” — जिला प्रशासन प्रतिनिधि