चंडीगढ़ (हरियाणा):- हरियाणा में एक ऐसी घटना सामने आई जिसने संवेदनशील लोगों को भीतर तक झकझोर दिया है। बताया जा रहा है कि जश्न के नाम पर एक गाय को जबरन शराब पिलाई गई। यदि किसी को यह मनोरंजन लगता है तो हमें सच में यह सोचना होगा कि इंसानियत की परिभाषा क्या रह गई है। जश्न वह होता है जिसमें खुशी बांटी जाए न कि किसी बेजुबान जीव को पीड़ा दी जाए।
गाय केवल एक पशु नहीं है बल्कि भारतीय समाज में आस्था और संवेदना का प्रतीक मानी जाती है। गांव हो या शहर वह परिवार का हिस्सा बनकर रहती है। ऐसे में किसी उत्सव के नाम पर उसे कष्ट देना केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों का भी अपमान है। जब इंसान अपनी खुशी के लिए किसी असहाय जीव को मजबूर करता है तो वह अपनी संवेदनशीलता खो देता है।
यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आधुनिकता के नाम पर हम करुणा को पीछे छोड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर दिखावे की संस्कृति ने कई बार लोगों को अजीब और अमानवीय हरकतें करने के लिए उकसाया है। लाइक और व्यूज की चाह में कुछ लोग यह भूल जाते हैं कि उनके कृत्य से किसी जीव को दर्द हो सकता है। जश्न का असली अर्थ उत्साह और सकारात्मकता है न कि क्रूरता।
कानून पशु क्रूरता को अपराध मानता है। पशु संरक्षण से जुड़े नियम साफ कहते हैं कि किसी भी जानवर को नुकसान पहुंचाना दंडनीय है। लेकिन कानून से पहले हमें अपने भीतर झांकने की जरूरत है। यदि हमारी संवेदना जागृत हो तो ऐसी घटनाएं होने ही न पाएंगी। समाज को मिलकर यह संदेश देना होगा कि मनोरंजन के नाम पर हिंसा स्वीकार नहीं है।
बच्चों और युवाओं को भी यह सिखाना जरूरी है कि हर जीव का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है। करुणा और सहानुभूति ही मानवता की असली पहचान हैं। यदि हम इन्हें खो देंगे तो विकास और प्रगति के सारे दावे खोखले रह जाएंगे। समय आ गया है कि हम जश्न की परिभाषा बदलें और यह सुनिश्चित करें कि हमारी खुशी किसी और की पीड़ा पर आधारित न हो। यही सच्ची इंसानियत है।