Jayshankar legacy /नई दिल्ली: मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में गहराते युद्ध के बादलों के बीच पूरी दुनिया की नजरें अब भारत और उसके रणनीतिक रुख पर टिकी हैं। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल दिया है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। इस संकटपूर्ण घड़ी में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हालिया तीन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर खलबली मचा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जयशंकर के इन बयानों ने न केवल भारत की तटस्थता को स्पष्ट किया है, बल्कि पश्चिमी देशों और अरब जगत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भारत इस संघर्ष में एक ‘गेम चेंजर’ की भूमिका निभा सकता है।
1. “युद्ध किसी के हित में नहीं, लेकिन सुरक्षा सर्वोपरि”
जयशंकर का पहला बड़ा बयान उस समय आया जब ईरान ने इजरायल पर मिसाइल दागने की शुरुआत की थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिंसा का यह दौर किसी भी पक्ष के लिए जीत लेकर नहीं आएगा। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि भारत हमेशा संवाद और कूटनीति का पक्षधर रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत अपने हितों और अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ समझौता करेगा। इस बयान को इजरायल के ‘आत्मरक्षा के अधिकार’ और ईरान की ‘संप्रभुता’ के बीच एक संतुलित लेकिन कड़ा संदेश माना जा रहा है।
2. “वैश्विक नियमों का चयनात्मक पालन अब नहीं चलेगा”
अपने दूसरे महत्वपूर्ण बयान में विदेश मंत्री ने पश्चिमी ताकतों की दोहरी नीति पर प्रहार किया। उन्होंने संकेत दिया कि वैश्विक शांति केवल तब स्थापित हो सकती है जब अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन सभी देशों के लिए समान हो। उन्होंने इशारों-इशारों में यह स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी भी गुट का हिस्सा बनकर अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा, बल्कि ‘राष्ट्र प्रथम’ (Nation First) के सिद्धांत पर अडिग रहेगा। इस बयान ने खासकर वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
3. “मिडल ईस्ट की अस्थिरता का सीधा असर भारत पर”
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण बयान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी देशों में रह रहे भारतीय प्रवासियों से जुड़ा था। जयशंकर ने चेतावनी दी कि यदि युद्ध और बढ़ा, तो इसके आर्थिक परिणाम केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि यह वैश्विक सप्लाई चेन को भी ध्वस्त कर देगा। उन्होंने साफ किया कि भारत इस क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए हर संभव मध्यस्थता के लिए तैयार है, बशर्ते दोनों पक्ष तनाव कम करने की इच्छा दिखाएं।
भारत की भूमिका क्यों है अहम?
भारत के ईरान और इजरायल दोनों के साथ ही बेहद मजबूत और रणनीतिक संबंध हैं। एक तरफ जहां इजरायल भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार है वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भारत के ऊर्जा संबंध और ‘चाबहार बंदरगाह’ जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट जुड़े हैं। ऐसे में जयशंकर की ‘स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी’ (रणनीतिक स्वायत्तता) की नीति ने दुनिया को हैरान कर दिया है कि भारत कैसे दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने में सफल रहा है।