Rajyasabha elections/नई दिल्ली:- देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए होने वाले आगामी चुनावों से ठीक पहले देश की राजनीति में बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। चुनाव प्रक्रिया के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मतदान से पहले ही विभिन्न राज्यों के 26 दिग्गजों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। निर्वाचित होने वाले इन नेताओं में देश की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार, केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले, भाजपा के वरिष्ठ नेता विनोद तावड़े और कांग्रेस के दिग्गज कानूनी विशेषज्ञ अभिषेक मनु सिंघवी जैसे बड़े नाम शामिल हैं। हालांकि जहाँ 26 सीटों पर स्थिति स्पष्ट हो चुकी है, वहीं बाकी बची 11 सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा होने की उम्मीद है। इन सीटों पर राजनीतिक समीकरणों की बिसात बिछ चुकी है और जोड़-तोड़ की राजनीति भी चरम पर है।
निर्विरोध निर्वाचन: दिग्गजों का दबदबा बरकरार
नामांकन वापसी की समय सीमा समाप्त होने के बाद चुनाव आयोग ने इन 26 उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने की पुष्टि की। निर्विरोध निर्वाचन का मुख्य कारण यह रहा कि इन सीटों पर संबंधित राजनीतिक दलों के पास पर्याप्त संख्या बल था और विपक्षी दलों ने हार सुनिश्चित देखते हुए अपने उम्मीदवार नहीं उतारे या अतिरिक्त नामांकन दाखिल नहीं किए।
* महाराष्ट्र का समीकरण: महाराष्ट्र में राजनीति की धुरी रहे शरद पवार (NCP-SP) और रामदास आठवले (RPI-A) एक बार फिर संसद पहुँचने में सफल रहे हैं। महाराष्ट्र की खाली सीटों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष ने आपसी सहमति और संख्या बल के आधार पर अपने पत्ते खेले, जिससे यहाँ बिना किसी मतदान के दिग्गजों की जीत का रास्ता साफ हो गया। भाजपा की ओर से विनोद तावड़े का निर्वाचन पार्टी के भीतर उनके बढ़ते कद को दर्शाता है।
* अभिषेक मनु सिंघवी की जीत: कांग्रेस के लिए राहत की खबर यह रही कि वरिष्ठ अधिवक्ता और नेता अभिषेक मनु सिंघवी भी निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। सिंघवी की मौजूदगी राज्यसभा में कांग्रेस की वैचारिक और कानूनी आवाज को मजबूती प्रदान करेगी।
11 सीटों पर फंसा पेंच: कड़े मुकाबले के आसार
जहाँ 26 नेता निर्विरोध चुन लिए गए हैं, वहीं 11 सीटें ऐसी हैं जहाँ ‘क्रॉस वोटिंग’ और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ की आशंका ने राजनीतिक गलियारों में गर्मी बढ़ा दी है। इन सीटों पर उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से अधिक है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में मुकाबला त्रिकोणीय या आमने-सामने का हो गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर विपक्षी समाजवादी पार्टी के खेमे में हलचल पैदा कर दी है। यहाँ हर एक वोट की कीमत बढ़ गई है और विधायक अपने पाले बदलने के लिए स्वतंत्र दिख रहे हैं, जो चुनाव को अनिश्चितता की ओर ले जा रहा है।
संसदीय समीकरणों पर प्रभाव
इन चुनावों के परिणाम राज्यसभा में शक्ति संतुलन को प्रभावित करेंगे। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) सदन में बहुमत के आंकड़े के और करीब पहुँचने की कोशिश में है, ताकि महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में कोई संवैधानिक बाधा न आए। वहीं, विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (I.N.D.I.A.) अपनी सीटों को सुरक्षित रखकर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है।