Indian Army Spirit : शहादत के बाद भी जिंदा है ‘फौजी भाईचारा’,21 जाट रेजीमेंट के जवानों ने शहीद साथी की बेटी का किया कन्यादान

Indian Army Spirit /बागपत(उत्तर प्रदेश):- भारतीय सेना में एक कहावत बहुत मशहूर है— “एक फौजी कभी अपने साथी को अकेला नहीं छोड़ता।” उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के काठा गांव में हाल ही में इस कहावत को हकीकत में बदलते देखा गया। जब 21 जाट रेजीमेंट के दर्जनों जवान वर्दी में सजे-धजे एक शादी समारोह में पहुंचे, तो वहां मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। यह शादी किसी बड़े अफसर की नहीं, बल्कि उनके दिवंगत साथी हवलदार हरेंद्र सिंह की बेटी प्राची की थी।

सरहद की दोस्ती, घर की दहलीज तक

हवलदार हरेंद्र सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके फौजी भाइयों ने यह महसूस होने नहीं दिया कि प्राची के सिर से पिता का साया उठ गया है। शादी की रस्मों से लेकर विदाई तक, इन रणबांकुरों ने हर वो फर्ज निभाया जो एक पिता को निभाना था। गांव की गलियों में जब सेना की गाड़ियां और वर्दीधारी जवान पहुंचे, तो पूरे गांव का माहौल जज्बाती हो गया।

जमीन पर हथेली बिछाकर बनाई ‘शाही राह’

शादी का सबसे भावुक कर देने वाला पल तब आया जब प्राची को स्टेज तक ले जाने की बारी आई। आमतौर पर इस रस्म में पिता या भाई साथ चलते हैं, लेकिन यहाँ दृश्य कुछ और ही था। 21 जाट रेजीमेंट के जवानों ने जमीन पर झुककर अपनी हथेलियां बिछा दीं। उन्होंने अपनी हथेलियों को कालीन की तरह इस्तेमाल किया और शहीद साथी की बेटी ने अपने ‘फौजी पिताओं’ के हाथों के ऊपर कदम रखते हुए स्टेज तक का सफर तय किया। यह दृश्य वीरता और संवेदना की पराकाष्ठा थी, जिसने इंटरनेट पर भी लाखों लोगों का दिल जीत लिया है।

6.30 लाख का सामूहिक कन्यादान और पूरी जिम्मेदारी

जवानों का यह प्रेम केवल प्रतीकात्मक नहीं था। उन्होंने शादी की तैयारियों में हाथ बँटाने से लेकर आर्थिक रूप से भी परिवार को सहारा दिया।

* सामूहिक योगदान: यूनिट के जवानों ने आपस में पैसे जोड़कर 6.30 लाख रुपये का कन्यादान दिया।

* रीति-रिवाज: मंडप में बैठकर कन्यादान की रस्म भी जवानों ने सामूहिक रूप से निभाई, ताकि माँ और बेटी को पिता की कमी महसूस न हो।

* सुरक्षा और सम्मान: विदाई के वक्त भी जवान एक दीवार बनकर खड़े रहे, जैसे वे सरहद पर खड़े होते हैं।

“रिश्ता सिर्फ ड्यूटी तक नहीं होता”

वहां मौजूद एक जवान ने भावुक होकर कहा, “हरेंद्र हमारा भाई था। हम साथ जिए, साथ लड़े। आज वह शारीरिक रूप से यहाँ नहीं है, तो क्या हुआ? हम उसकी कमी को कभी खलने नहीं देंगे। यह बेटी सिर्फ उसकी नहीं, पूरी 21 जाट रेजीमेंट की बेटी है।”

इस घटना ने साबित कर दिया है कि फौजी की वर्दी के भीतर एक बेहद संवेदनशील दिल धड़कता है। अनुशासन और सख्ती के लिए जानी जाने वाली भारतीय सेना ने दिखा दिया कि उनके लिए ‘शहादत’ का मतलब सिर्फ नाम की पट्टिका नहीं, बल्कि शहीद के परिवार के साथ अंतिम सांस तक खड़ा रहना है। काठा गांव आज गौरवान्वित है। प्राची की विदाई भले ही गमगीन थी, लेकिन उसके पास यह गर्व करने की एक बड़ी वजह है कि उसके एक नहीं, बल्कि सैकड़ों पिता हैं जो आज भी देश और अपने परिवार के लिए सरहद पर सीना तानकर खड़े हैं।

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