जौनपुर (उत्तर प्रदेश):- चंदवक जौनपुर उत्तर प्रदेश से प्रस्तुत यह आध्यात्मिक चिंतन मनुष्य के भीतर छिपे सत्य को समझने का मार्ग दिखाता है। जीवन में सबसे बड़ी बाधा अहंकार है जो मनसा वाचा और कर्मणा तीनों स्तर पर व्यक्ति को सत्य से दूर करता है। जब मनुष्य अपने भीतर “मैं” के स्वरूप की खोज करता है तब धीरे धीरे इस अहंकार का नाश होने लगता है।
अहंकार वास्तव में कोई स्थायी तत्व नहीं है बल्कि यह अज्ञान से उत्पन्न एक भ्रम है। जब व्यक्ति अपने भीतर झांकता है और यह समझने का प्रयास करता है कि यह “मैं” कहां से उत्पन्न होता है तब वह स्वयं ही विलीन हो जाता है। यही आत्मज्ञान की शुरुआत है।
जब अहंकार समाप्त होता है तब व्यक्ति परमेश्वर के साथ एकात्मता का अनुभव करता है। यही अवस्था आत्मा की वास्तविक और स्वाभाविक स्थिति है। इस अवस्था में न केवल “मैं” का बोध समाप्त होता है बल्कि “तुम” और “वह” का भेद भी मिट जाता है। तब केवल एक ही सत्य शेष रह जाता है जो परम सत्ता के रूप में प्रकाशमान होता है।
विचारों का शांत होना भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भाग है। जब मन में उठने वाले सभी विचार शांत हो जाते हैं तब भीतर का प्रकाश प्रकट होता है। यही शुद्ध चेतना है जो न तो शरीर में सीमित है और न ही बुद्धि में बंधी हुई है।
अहंकार ही संसार के बंधनों का मूल कारण है। यही जन्म मृत्यु के चक्र को बनाए रखता है। यदि इस अहंकार रूपी जड़ को समाप्त कर दिया जाए तो जीवन के सभी दुख और भ्रम स्वतः समाप्त हो जाते हैं। संसार को एक स्वप्न के समान समझना और शाश्वत सत्य की खोज करना ही मोक्ष का मार्ग है।
इस मार्ग पर चलने के लिए अज्ञान की बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। जब मनुष्य सच्चे भाव से आत्मचिंतन करता है तब उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है। यही ज्ञान उसे मुक्त करता है और यही जीवन का अंतिम सत्य है।