नई दिल्ली :- दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण अब किसी एक मौसम की समस्या नहीं रह गई है। हर साल तारीख बदलती है लेकिन हवा की हालत लगभग वैसी ही बनी रहती है। सर्दियों में स्मॉग गर्मियों में धूल और पूरे साल जहरीली गैसें लोगों की सांसों में जहर घोलती रहती हैं। दिल्ली गाजियाबाद नोएडा और फरीदाबाद जैसे इलाके लगातार सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में गिने जाते हैं।
इस समस्या की सबसे बड़ी वजह तेजी से बढ़ता शहरीकरण है। सड़कों पर वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पुराने डीजल वाहन और ट्रैफिक जाम हवा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा आसपास के राज्यों में पराली जलाने से उठने वाला धुआं दिल्ली एनसीआर की हवा को और जहरीला बना देता है। निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआं भी स्थिति को गंभीर बनाता है।
प्रदूषण का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। बच्चों में सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं। बुजुर्गों को दमा और हृदय रोग का खतरा अधिक हो गया है। कामकाजी लोगों की उत्पादकता घट रही है जिससे आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। अस्पतालों पर बोझ बढ़ता जा रहा है और इलाज पर खर्च आम परिवार के लिए मुश्किल बनता जा रहा है।
समाधान के लिए केवल आपात कदम काफी नहीं हैं। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना जरूरी है ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और पुराने प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को हटाना जरूरी है। किसानों को पराली न जलाने के लिए तकनीक और आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। उद्योगों पर सख्त निगरानी और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के नियमों का पालन अनिवार्य होना चाहिए।
जब तक सरकार प्रशासन उद्योग और नागरिक मिलकर जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे तब तक दिल्ली एनसीआर की हवा साफ होना मुश्किल है। स्थायी समाधान ही आने वाली पीढ़ियों को इस संकट से बचा सकता है।