वाशिंगटन (अमेरिका):- हाल ही में वेनेजुएला को लेकर बढ़े अंतरराष्ट्रीय तनाव के बाद अमेरिका की राजनीति में एक पुराना सिद्धांत फिर से चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में मोनरो सिद्धांत का उल्लेख किया जिसके बाद दुनिया भर में इस पर बहस शुरू हो गई। करीब दो सौ वर्ष पहले सामने आया यह सिद्धांत कभी अमेरिका की विदेश नीति की बुनियाद माना जाता था।
मोनरो सिद्धांत की घोषणा वर्ष अठारह सौ तेईस में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने की थी। इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य यह था कि यूरोपीय शक्तियां अमेरिका महाद्वीप में किसी भी तरह का हस्तक्षेप न करें। अमेरिका ने यह साफ कर दिया था कि पश्चिमी गोलार्ध में किसी बाहरी ताकत की दखल को वह अपने खिलाफ कदम मानेगा। उस समय यह नीति अमेरिका की सुरक्षा और प्रभाव बढ़ाने के लिए बनाई गई थी।
समय के साथ मोनरो सिद्धांत का स्वरूप बदलता गया। बीसवीं सदी में इसका उपयोग कई बार लैटिन अमेरिकी देशों में हस्तक्षेप को सही ठहराने के लिए किया गया। अमेरिका ने इस सिद्धांत के तहत यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अपने पड़ोसी देशों की राजनीति और सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभाएगा। हालांकि बाद के वर्षों में इसे औपचारिक रूप से कम ही इस्तेमाल किया गया।
वेनेजुएला संकट के दौरान ट्रंप द्वारा इस सिद्धांत का जिक्र करना कई संकेत देता है। इससे यह साफ होता है कि अमेरिका अब भी लैटिन अमेरिका को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है। ट्रंप का बयान यह दर्शाता है कि अमेरिका क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पुरानी सोच को फिर से सामने ला सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की वैश्विक व्यवस्था उन्नीसवीं सदी से काफी अलग है। ऐसे में मोनरो सिद्धांत का दोबारा उल्लेख करना कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है। फिर भी यह बहस तेज हो गई है कि क्या अमेरिका भविष्य में इस पुराने सिद्धांत को नई नीति के रूप में अपनाने की कोशिश करेगा। यही वजह है कि दो सौ साल बाद भी मोनरो सिद्धांत एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है।