Bihar elections पटना:- बिहार की राजनीति में इन दिनों शाहाबाद क्षेत्र (भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर) सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। कभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का मजबूत गढ़ माने जाने वाला यह इलाका पिछले दो बड़े चुनावों— 2020 विधानसभा और 2024 लोकसभा— में गठबंधन के लिए सबसे बड़ी कमजोर कड़ी साबित हुआ है। 22 विधानसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में 2020 में NDA को सिर्फ दो सीटों पर संतोष करना पड़ा था, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में भी चारों सीटें महागठबंधन के खाते में चली गईं। अब आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या NDA इस इलाके में अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर पाएगी?
NDA के खराब प्रदर्शन की वजह
शाहाबाद में NDA की हार के पीछे कई बड़े कारण रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण कारक वोटों का बिखराव था। 2020 विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) का NDA से अलग होकर चुनाव लड़ना निर्णायक साबित हुआ। इन दलों ने गठबंधन के पारंपरिक वोट बैंक (दलित और कुशवाहा) में सेंध लगाई जिससे कई सीटों पर महागठबंधन (MGB) को जीत मिली।
2024 लोकसभा चुनाव में भी यही कहानी दोहराई गई। काराकाट सीट पर उपेंद्र कुशवाहा के NDA उम्मीदवार होने के बावजूद भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह के निर्दलीय चुनाव लड़ने से राजपूत और कुशवाहा वोटों में बड़ा बिखराव हुआ जिसका सीधा फायदा महागठबंधन को मिला। इसके अलावा इस इलाके में भाकपा माले (CPI-ML) की मजबूत उपस्थिति और महागठबंधन के साथ उसका गठबंधन खासकर गरीब तबके और कुछ पिछड़ी जातियों के बीच NDA के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
वापसी के लिए NDA की नई रणनीति
शाहाबाद में पिछली गलतियों से सबक लेते हुए, NDA ने इस बार एक सधी हुई रणनीति बनाई है जिसे कुछ लोग ‘ऑपरेशन शाहाबाद’ का नाम भी दे रहे हैं।
– सामाजिक समीकरण को मजबूत करना: NDA ने इस बार उन दोनों प्रमुख नेताओं— चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा— को अपने पाले में वापस ला दिया है जिनके अलग होने से पिछले चुनावों में नुकसान हुआ था। इसके साथ ही भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह को भी गठबंधन के लिए सक्रिय रूप से काम करने के लिए मनाना राजपूत वोटों को एकजुट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बीजेपी का मानना है कि इन तीनों को साथ लाने से राजपूत और कुशवाहा समुदाय के वोटों का बिखराव रुक जाएगा।
– गृह मंत्री अमित शाह का फोकस: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद शाहाबाद और मगध क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर बूथ स्तर की रणनीति पर जोर दिया है और 80% सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है।
– विकास योजनाओं पर भरोसा: NDA, नीतीश कुमार सरकार की “मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना” (जिसके तहत महिलाओं को ₹10,000 की नकद राशि दी गई) जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर भी दांव लगा रही है। गठबंधन को उम्मीद है कि ये योजनाएं महिला मतदाताओं को उसके पक्ष में लामबंद करेंगी।
– उम्मीदवारों का चयन: सीट-दर-सीट जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया जा रहा है। उदाहरण के लिए रोहतास की सासाराम सीट पर उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी को उम्मीदवार बनाना कुशवाहा समुदाय को साधने की एक स्पष्ट कोशिश है।
चुनौती बरकरार, मुकाबला कड़ा
NDA ने भले ही अपनी रणनीति को मजबूत किया हो लेकिन शाहाबाद में वापसी की राह आसान नहीं है। महागठबंधन भी अपने गढ़ को बचाने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। वाम दलों (CPI-ML) और राजद का मजबूत गठबंधन, युवा नेता तेजस्वी यादव की लोकप्रियता, और स्थानीय विकास के मुद्दे (जैसे सड़कों की खराब स्थिति, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवा) अभी भी महागठबंधन के पक्ष में माहौल बना सकते हैं यह क्षेत्र लंबे समय से समाजवादी और वामपंथी राजनीति का केंद्र रहा है और पिछड़ों, दलितों तथा अल्पसंख्यकों का बड़ा वोट बैंक MGB के साथ मजबूती से खड़ा है।