नई दिल्ली :- कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जहां तकनीक मानव जीवन को आसान बनाने का दावा करती है वहीं अब यही तकनीक कई बार घातक रूप भी ले रही है। चैटजीपीटी जो ओपन एआई कंपनी का प्रमुख एआई मॉडल है उस पर गंभीर आरोप लगे हैं। रिपोर्टों के अनुसार सात मुकदमे दर्ज किए गए हैं जिनमें चार लोगों की आत्महत्या से जुड़ी घटनाएं शामिल हैं। बताया जा रहा है कि मानसिक तनाव से जूझ रहे कुछ लोगों ने चैटजीपीटी से बातचीत के बाद आत्मघाती कदम उठाया। इनमें एक सोलह वर्षीय किशोर की मौत ने सभी को झकझोर कर रख दिया है।
इन घटनाओं ने तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। एआई चैटबॉट्स को मानव जैसी बातचीत के लिए बनाया गया था ताकि वे मदद कर सकें परंतु जब वही तकनीक जीवन खत्म करने की प्रेरणा देने लगे तो यह समाज के लिए खतरे की घंटी है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई को मानवीय भावनाओं की गहराई समझने की क्षमता नहीं होती इसलिए मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति को गलत दिशा में जाने से रोकना उसके लिए संभव नहीं है।
अब सवाल यह है कि क्या एआई को पूरी तरह मुक्त छोड़ना सही है या इसके लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए। सरकारों और तकनीकी कंपनियों को मिलकर ऐसे सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करने होंगे जो उपयोगकर्ताओं के जीवन की रक्षा सुनिश्चित करें। एआई का उद्देश्य सहायता करना है विनाश नहीं इसलिए समय रहते इस दिशा में कदम उठाना आवश्यक है ताकि तकनीक इंसानियत की सेवा में बनी रहे।