नई दिल्ली :- दिल्ली में अवैध निर्माण और अतिक्रमण की समस्या वर्षों से गंभीर बनी हुई है। इस समस्या के समाधान के प्रयासों में सबसे बड़ी बाधा बन रहा है दिल्ली स्पेशल प्रोविजंस एक्ट। यह एक्ट 2007 में पेश किया गया था और इसे दिसंबर 2026 तक बढ़ाया गया है। मूल उद्देश्य राजधानी में नियमन को सुदृढ़ करना था लेकिन व्यवहार में यह कानून अवैध निर्माण पर कार्रवाई में रोड़ा बन गया है।
दिल्ली में अनुमानित पचास लाख से अधिक अवैध निर्माण हैं। मकान मालिक और व्यापारिक स्थल बनाने वाले इस एक्ट का हवाला देकर कार्रवाई से बचते हैं। सरकारी एजेंसियों को इस एक्ट के कारण अक्सर कार्रवाई रोकने या टालने के आदेश मिलते हैं। परिणामस्वरूप अवैध निर्माण निरंतर बढ़ रहे हैं और नियमों का पालन करने वाले नागरिकों की मेहनत और जमीन पर असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक्ट मूल उद्देश्य से भटक गया है। इसे पारदर्शिता और प्रभावी निगरानी के साथ लागू करने की आवश्यकता है। अगर यही स्थिति जारी रही तो दिल्ली में अतिक्रमण और अवैध निर्माण का दायरा और बढ़ सकता है। नागरिकों के लिए यह समस्या केवल कानूनी नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी कठिनाई पैदा कर रही है।
सरकार और नगर निगम ने कई बार इस मामले को सुलझाने की कोशिश की लेकिन दिल्ली स्पेशल प्रोविजंस एक्ट के प्रावधानों ने कार्रवाई को सीमित कर दिया। अब समय आ गया है कि इस एक्ट की समीक्षा की जाए और इसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित किया जाए। तभी राजधानी में अवैध निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा और दिल्ली का शहरी नियोजन बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।