नोएडा (उत्तर प्रदेश):- देश की राजधानी दिल्ली का बोझ कम करने के उद्देश्य से जब नोएडा और ग्रेटर नोएडा की नींव रखी गई थी तब उम्मीद की गई थी कि ये क्षेत्र आधुनिक योजना वाले स्मार्ट शहर बनेंगे। चौड़ी सड़कें विशाल सेक्टर और औद्योगिक क्षेत्र तो बन गए लेकिन स्मार्ट सिटी का सपना अधूरा रह गया। आज इन इलाकों में लगभग तीस लाख की आबादी बस चुकी है फिर भी लोगों को साफ पानी सीवरेज सिस्टम सार्वजनिक परिवहन और ट्रैफिक प्रबंधन जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
स्मार्ट सिटी मिशन के तहत यहां तकनीकी ढांचे के विकास की योजनाएं बनाई गई थीं परंतु धरातल पर उनका प्रभाव सीमित रहा। स्मार्ट लाइटें सीसीटीवी नेटवर्क और सेंट्रल मॉनिटरिंग सिस्टम जैसे प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं। सड़कों पर जाम की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और जगह जगह गड्ढे आम बात बन चुके हैं। ग्रेटर नोएडा में कई आवासीय परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं जिससे हजारों परिवार परेशान हैं।
शहरों में विकास का ढांचा तो तैयार हो गया है लेकिन योजनाओं में समन्वय की कमी स्पष्ट नजर आती है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय प्रशासन को पारदर्शी नीति बनानी होगी और नागरिक सहभागिता को बढ़ाना होगा तभी ये शहर स्मार्ट बन पाएंगे। दैनिक जागरण की मुहिम इसी दिशा में एक अहम कदम है जो इन शहरों की समस्याओं को उजागर कर समाधान की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही है। अगर प्रशासन उद्योग और नागरिक एकजुट होकर काम करें तो नोएडा और ग्रेटर नोएडा वाकई में देश के आदर्श स्मार्ट शहरों की सूची में शामिल हो सकते हैं।